KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

हिन्दी कविता: अंतकाल-मनीभाई नवरत्न

मुझे शिकवा नहीं रहेगी
गर तू मुझे छोड़ दे,
मेरे अंतकाल में।
मुझे खुशी तो जरूर होगी
कि हर लम्हा साथ दे ,
तू मेरे हर हाल में।
हां !मैं जन्मदाता हूँ।
तेरा भाग्यविधाता हूँ।
मुझे अच्छा लगता है,
जो कभी समय बिताता हूँ.
तेरे संग मैं।

मेरा चिराग है तू
सबको बताता हूँ.
कभी मुस्कुराता हूँ
और आंखें भर जाता हूँ।
जो अपना कहके तुझे
मेरा हक जताता हूँ।
और ना दे पाता समय
जितना तेरे लिए संसाधन जुटाता हूँ।

लोग कहे तू मेरी छायाप्रति
मेरे वंश की पकड़े मशाल ज्योति।
मुझसे ही निर्धारित भविष्य मेरा
मैं कृषक हूँ और तू फसल मेरा।
कल जो तू होगा
मेरे परवरिश से।
कल तो मेरा भी होगा
मेरे परवरिश से।

तू बोझ नहीं मेरा
फूल की डाली है।
घर का कोना कोना सजा दे
वो भावी माली है।
तुझे ताड़ना और फटकार
मेरी मजबूरी है।
आ पास आ ,करूँ लाड़ दुलार
तू मेरी कमजोरी है।
धीरे धीरे तुझमें सिमटता
मेरा जीवन सारा।
तेरे संग बहता जाऊँ
है ये मोह की धारा।

जग में कुसंस्कारों की
चलती है चाकू छूरियां।
मेरे रहते परवाह ना कर
अभी जान बची है
इस ढाल में।
तुझे शिकवा नहीं रहेगी
कि मैंने छोड़ दिया अकेला
तेरे अंतकाल में।

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