KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

अपना सच्चा साथी- मनीभाई नवरत्न

अपना सच्चा साथी

इस जिंदगी में
खड़ा बनके जो सच्चा साथी
जो कभी ना छोड़े अकेला।
यूं तो दुनिया है मेला
पर बिन इसके सब छूट जाने हैं ।
कांच की गुड़िया सी टूट जाने हैं।
ये जानते हुए भी
हम क्यों इसे अपनाते नहीं?
आजीवन हमसाया को
सीने से लगाते नहीं?



हमारे अनदेखी से,
जो बुरा नहीं मानता ।
बेशर्म की भांति
मुंह उठाए खड़ा रहता है ।
वह मेहनत सिखाना चाहता है ।
बताता है कौन बुरा, कौन भला?
जिसकी काया, परछाई से भी काली ।
ये बेस्वाद, कुरूप, दर्दीला
तड़पाता है जी भर के ।
आईना दिखाता है हमें
अस्तित्व बोध कराता है हमारा ।

यूं तो हमारी चाहत नहीं है इस पर
पर जब भी आता है
हम बेमन होकर
घुटने टेक कर प्रार्थना करते हैं
दया की भीख मांगते हैं।
चले जाने को हमारी जिंदगी से।
पर जाने से पहले
वो हमें आंसूओं के भार से
मुक्त कराता है ।

देर ही सही “दुख” को मैंने माना
अपना सच्चा साथी ।
ना जाने क्यों बेवफा “सुख” के पीछे
भागते हम दिन रात
जो हमें विलास में
आलसी कर देना चाहता है ।
प्रगति का अवरोधक “सुख”
जो मोह से छोड़ी नहीं जाती ।
मैं जबरन अपने को
इसके बीच फंसाता हूं ।
“सुख” मुझे हमेशा की तरह दगा दे जाता है
और मिलता है आसरा दुख का मुझे।
कोई भला असल प्रेम छोड़
झूठे के पीछे होता है भला?
खैर….
मुझे काबिल बनाने के लिए
खड़ा ही रहता है दुख।

@मनीभाई नवरत्न

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