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अपनी भाषा हिन्दी

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अपनी भाषा हिन्दी    

गहरा संबंध है,
सादगी और सौंदर्य में
स्वाभाविकता और अपनत्व में।
नकल में तो आती है,
बनावट की बू।
बोलने में सिकुड़ती है
नाक और भौं।
जो है, उससे अलग दिखने की चाह।
पकड़ते अपनों से अलग होने की राह।
मत सोचिये कि निरर्थक कहे जा रही,
क्योंकि अब मैं अपनी बात पे आ रही।

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बात साफ है,
हिन्दी और अंग्रेजी की,
देशी और विदेशी की।
दम लगा देते हैं एक का
बोलने का लहजा सीखने में।
कमी तो फिर भी रह ही जाती है,
कुछ कहने में।
हिंदी बोलने में उनके
हर दो शब्द बाद अंग्रेजी है,
लगता है बात शान से सहेजी है।

पर अपनी भाषा का तो
होता है निराला अंदाज ।
बिना किसी बनावट के
किया गया आगाज।
बसे हैं इसमें अपने रीत रिवाज,
बजते हैं इसी में हमारे हर साज।
आती इसमें अपनी माटी की
सौंधी गंध,
बसती है इसमें माँ की रक्षा की सौगन्ध।
पावन प्राणवायु सी
जो करती श्वांसों का संचार
मादक पुहुप सुरभि सी,
करती जिजीविषा का प्रसार।
परींदे के नूतन परों सी,
जो भरते उन्मुक्त उड़ान।
सप्त सुरों के साधन सी
छिड़ता जीवन का राग।
अदृश्य के आराधन सी
सधता जिससे विराग
हिंद की होती विश्व में
हिंदी से ही पहचान।
हिंदी से  ही पहचान।

पुष्पा शर्मा”कुसम”

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