KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

अर्धांगिनी

पत्नी को अर्धांगिनी कहने वाले कई बार उन्हें अर्धांगिनी का वास्तविक दर्ज़ा नहीं दे पाते।इस कविता के माध्यम से मैं यही कहना चाहती हूँ कि शब्दों में नहीं, दिल से पत्नी को अर्धांगिनी मानें।

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अर्धांगिनी


कहने को तो पत्नी अर्धांगिनी कहलाती है,
पर कितनी खुशकिस्मत औरतें ये दर्ज़ा पाती हैं।
घर में रहने वाली औरतें हाउसवाइफ कहलाती हैं,
वो तो कभी किसी गिनती में ही नहीं आती हैं।

चाहे ज़माना लाख कहे कि औरतें हैं महान,
पर घर में रहने वाली औरतों को तो सब समझते हैं बेकार सामान।

क्या करती रहती हो घर पर?ये उलाहना तो आम है,
बाहर जाकर काम करने वाली औरतें ही सबकी नज़रों में महान है।

घर, बच्चों, बड़े-बूढों को संभालना तो सबको मामूली काम लगता है,
उन्हें बात-बात में नीचा दिखाना अब बड़ा आम लगता है।

फिल्मों के ज़रिए लोगों को बताना पड़ता है,
हाउसवाइफ का काम अब लोगों को जताना पड़ता है।

जिन working women पर महानता का tag लगा है,
कभी उनसे पूछा कि तेरा हाल क्या है?

चाहे बाहर हाड़तोड़ मेहनत कर थकी-हारी घर आती है,
फिर भी घर-गृहस्थी संभालने की ज़िम्मेदारी उसी के ही हिस्से आती है।

दो पाटों के बीच पिसती रहती है,
ये औरतें अपने आप में बस घुटती रहती हैं।

कभी कुछ नहीं कह पाती मुँह से क्या उनकी चाहत है,
प्यार और सम्मान, बस यही देती उनको राहत है।

गर ये भी ना दे पाओ तो उसे अर्धांगिनी भी ना कहना,
ख़ुद के आधे हिस्से को सम्मान और आधे हिस्से को तिरस्कार कभी ना देना।

क्या हुआ जो पत्नी के सोते तुमने थाली परोस कर खा ली,
क्या हुआ जो पत्नी किचन में काम कर रही थी,इसलिए शर्ट तुमने खुद निकाली,
क्या हुआ जो एक ग्लास पानी तुमने खुद लेकर पिया,
क्या हुआ जो आज तुमने अपना बिस्तर समेटा,
क्या हुआ जो आज बाज़ार से सामान लाना पड़ा,
क्या हुआ जो आज दाल में तेज नमक खाना पड़ा,
क्या हुआ जो कभी समय पर चाय नहीं मिली,
क्या हुआ जो आज की फरमाइश आज पूरी नहीं हुई।

जो अपना पूरा जीवन adjust करके निकाल देती है,
जो अपनी पसंद-नापसंद भी बिसार देती है,
जो कभी-कभी बिन बात के भी गुस्सा हो जाती है,
जो कभी रूठ जाती है,कभी चिड़चिड़ाती है।
वो सिर्फ तुम्हारा ध्यान पाना चाहती है,
कुछ बातें गुस्से में बताकर तुम्हें सिखाना चाहती है।
क्योंकि वह जानती है कि जिन बातों पर उसे गुस्सा आता है,
उसके जाने के बाद उन आदतों में प्यार जताकर देखने वाला और कोई नहीं होता है।

ये पति-पत्नी दोनों जीवन गाड़ी के हैं दो पहिये,
ये बात सौ प्रतिशत सही है,इसे झूठी ना कहिये।

लड़खड़ा जाएगी ये गाड़ी गर औरत साथ ना देगी,
जितना सम्मान देती है, ये उतना सम्मान भी चाहेगी।

गर खिलखिलाते चेहरे पर चुप की चुप्पी छा जाएगी,
तो ना होली पर ना दिवाली पर घर में रौनक नज़र आएगी।

गर सच्चे दिल से औरत को समानता का दर्ज़ा देते हो,
घर को उनकी ज़रूरत है, ये सच्चे दिल से कहते हो,
तो बस प्यार और सम्मान से उन्हें सींचते रहिएगा,
चाहे housewife हो या working wonen,

उन्हें अपनेपन का साथ देते रहियेगा।
जैसे खूबसूरती दिखाने वाला आईना भी टूटकर
एक चेहरे को हज़ार चेहरों में बिखेर देता है,
उस तरह से औरत के आत्मसम्मान को टूटकर कभी बिखरने ना दीजियेगा।

श्रीमती किरण अवधेश गुप्ता

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