अरे लकीर के फकीरों

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अरे लकीर के फकीरों

अपने-अपने मुहावरों पर
वे और तुम
जिते आ रहे हो सदियों से
मुहावरा कभी बदला ही नहीं
न उनका न तुम्हारा

शासक हैं वे
बागडोर है उनके हाथों में
वे अपने मुहावरों पर
रहते हैं सदा कायम

तुम्हारे लिए
वे जो भी कहते हैं
कभी नहीं बदलते
चाहे जो हश्र हो तुम्हारा
वे अपने मुहावरों के पक्के हैं

एक बार कह देने के बाद
‘पत्थर की लकीर’ होती है
उनकी बातें
यही तो उनका मुहावरा है

उम्मीद कतई मत रखो
कि तुम्हारे हितों में
वे बदलेंगे
अपने जिद्दी मुहावरे और स्याह उसूल

तुम्हारी माँग
या तुम्हारी याचना
उसके अहम भरे उसूलों को
कभी नहीं बदल सकते

शासित हो तुम
तुम्हारे मन-मस्तिष्क में
गहरे रच-बस गए हैं
उनकी बागडोर का हsउsआ

तुम भी
अपने जीर्ण-शीर्ण उसूलों के
कम पक्के तो नहीं हो
अपने स्याह उसूलों पर
चिपके रहते हो एकदम अडिग

तुम तो
अपनों के लिए भी
नहीं बदलते हो
अपने थोथे उसूल

बदलना तुम्हारी फ़ितरत ही नहीं
तुम मरते दम तक
बस ‘लकीर के फ़कीर’ बने रहते हो

एक बात जान लो
उनके पत्थर की लकीर बातों को
उनके दंभी उसूलों को
उनके जिद्दी मुहावरों को
बदलने के लिए
पहले तुम्हें बदलनी ही होगी
अपनी’लकीर के फ़कीर ‘वाली
सदियों पुरानी वह आदत
और
अपना घीसा-पिटा वह मुहावरा।

नरेन्द्र कुमार कुलमित्र
9755852479

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