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प्रेम का मर जाना

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प्रेम का मर जाना

डॉ सुशील शर्मा

प्रेम का मरना ही आदमी का मरना है
जब प्रेम मरा था तो
बलि प्रथा सती प्रथा उगी थीं
प्रेम के मरने पर ही
धरती की सीमायें सिमट जातीं है।
महाद्वीप ,देश ,प्रदेश ,भाषाओं
जाति समुदाय ,मनुष्य ,जानवर का भेद होता है।

प्रेम मरता है तो
हिटलर ,मुसोलिनी ,औरंगजेब
बगदादी ,ओसामा पैदा होते हैं।
प्रेम मरता है तो
मंदिर ,मस्जिद ,चर्च में
ईश्वर की जगह साँप बैठ जाते हैं।

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प्रेम मरता है तो
आतंकवादी हमले, सेक्स
गुलामी, नस्लवाद,
दुनिया में भूख से मरते हुए लोग जिन्दा होते हैं।
प्रेम के मरने पर
स्नेह ,संकल्प , साधना ,
आराधना , उपासना
सब वासना बन जाते हैं।

आइये हम सब कोशिश करें
ताकि प्रेम जिन्दा रहे
और हमारा अस्तित्व बना रहे
हमारा शरीर भले ही मर जाए
किन्तु हम जिन्दा रहें मानवता में
अनंत युगों तक।

डॉ सुशील शर्मा

कविता बहार से जुड़ने के लिये धन्यवाद

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