KAVITA BAHAR
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और दम्भ दह गये- बाबूलालशर्मा *विज्ञ*

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और..दम्भ दह गये

घाव ढाल बन रहे
. स्वप्न साज बह गये।
. पीत वर्ण पात हो
. चूमते विरह गये।।

काल के कपाल पर
. बैठ गीत रच रहा
. प्राण के अकाल कवि
. सुकाल को पच रहा
. सुन विनाश गान खग
रोम की तरह गये।
पीत वर्ण……….।।

फूल शूल से लगे
मीत भयभीत छंद
रुक गये विकास नव
. छा रहा प्राण द्वंद
. अश्रु बाढ़ चढ़ रही
डूब बहु ग्राह गये।
पीत……………।।

चाह घनश्याम मन
. रात श्याम आ गई
. नींद एक स्वप्न था
. खैर नींद भा गई
. श्वाँस छोड़ते बदन
वात से जिबह हुये।
पीत……………..।।

जीवनी विवाद मय
जन्म मर्त्य कामना
.देख रहे भीत बन
. काल चाल सामना
. शेर से दहाड़ हम
छोड़ कर जिरह गये।
पीत ……………….।।

देश देश की खबर
. काग चील हँस रहे
. मौन कोकिला हुई
. काल ब्याल डस रहे
. लाश लापता हुई
मेघ शोक कह गये।
पीत…………….।।

शव सचित्र घूमते
. मौन होड़ पंथ पर
. गड़ रही निगाह अब
. भारतीय ग्रंथ पर
. शोध के बँबूल सब
सिंधु की सतह गये।
पीत……………..।।

शून्य पंथ ताकते
. रीत प्रीत रो पड़ी
. मानवीय भावना
. संग रोग हथकड़ी
. दूरियाँ सहेज ली
धूप ले सुबह गये।
पीत………….।।

खेत सब पके थके
. ले किसान की दवा
. तीर विष बुझे लिए
. मौन साधती हवा
. होंठ सूख वृक्ष के
अश्रु मीत बह गये।
पीत…………….।।

ताण्डवी मशान से
. मजार है मिल रही
. कब्र की कतार में
. मौत वस्त्र सिल रही
. कफन की दुकान के
गुबार हम सह गये।
पीत……………..।।

काट वृक्ष भूमि तन
. स्वास्थ्य मूल खो रहे
. सिंधु नीर सर नदी
. जगत गंद ढो रहे
. काल की मजार ले
फैसले सुलह नये।
पीत……………।।

देव स्वर्ग में बसे
. काल दूत डोलते
. रक्त बीज बो रहे
. गरल गंध घोलते
. नव विषाणु फौज के
खिल रहे कलह नये
पीत………………।।

विहंग निज पर कुतर
. प्रेम पत्र ला रहे
. पेड़ फूल डालियाँ
. गिरि शिखर हिला रहे
. सिंधु आँच दे रहे
और दम्भ दह गये।
पीत……………. ।।

कामिनी सजा रही
. गात मौत मीत के
ढूँढ रही मौत शव
. गीत संग रीत के
. प्रीत की उमंग में
छंद दंग रह गये।
पीत…………..।।

स्वदेश में प्रवास से
. जागरूक भारती
. शूल बन फूल संग
. यत्न कर्म पालती
. हार गई मौत तब
देख हम फतह हुये।
पीत………………।।

चल दिए छंद छोड़
. पीढ़ियाँ सहेज कर
. सह लिए घाव ताप
. सच से परहेज कर
. आज नींद सी खुली
लोक पुण्य ग्रह गये।
पीत……………..।।

बीत गये रोग सब
सोच प्राण हँस रहा
भव के अकाल भूल
. मोह मान फँस रहा
. जग रहा *अहम* भाव
*वयम्* अन्त गृह गये।
पीत…………………।।

ताक रहे विश्व जन
. विहँस रही भारती
. विश्व जीत देश मम
. देह मान आरती
. सर्व लोक मान्यतम्
विश्व गुरू कह गये।
पीत… वर्ण.. पात..हो
चूमते… विरह…गये।।
. 👀🤷🏻‍♀👀
✍©

बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
बौहरा भवन,३०३३२६
सिकंदरा, दौसा राजस्थान, ३०३३२६
मो.नं. ९७८२९२४४७९

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