KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

और शाम हो जाती है

Prakash Bisht

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और शाम हो जाती है
हर सुबह जिंदगी को बुनने चलता हूं

उठता हूं,गिरता हूं,संभालता हूं और शाम हो जाती है।
अपने को खोजता हूं,

सपने नए संजोता हूं

पूरा करने तक शाम हो जाती है।
जिंदगी तुझे समझने में,

दिल तुझे समझाने की कश्मकश में शाम हो जाती है।
सुखों को समेटता दुखों को लाधता कुछ समझ पाऊं इस से पहले शाम हो जाती है।
धुंधली कभी आशा की एक किरण आती है

पकड़ पाऊं उसे के शाम हो जाती है।
सबके भरोसे पर खरा उतरता हूं

जब अपनी बारी आती है तो शाम हो जाती है।
फलसफा ये जिन्दग़ी का कैसा है

इसे महसूस करूं इसमें ही उम्र गुजर जाती है और शाम हो जाती है।
राग,द्वेष भावना सारी उम्र भर कमाते है,

पुण्य इन्सान कमाने चले तो शाम हो जाती है।