KAVITA BAHAR
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पत्थर दिल कब पिघले

गीत/नवगीत*. (१६,१२)*पत्थर दिल कब पिघले* पत्थर दिल कब पिघले लता लता को खाना चाहे,कली कली को निँगले!शिक्षा के उत्तम स्वर फूटे,जो रागों को निँगले!सत्य बिके

सन्नाटों के कोलाहल में

सन्नाटों के कोलाहल में सन्नाटों के कोलाहल मेंनदियों के यौवन पर पहरा।लम्पट पोखर ताल तलैयासोच रहे सागर से गहरा।।. १ज्वार उठा सागर में भारीलहरों का उतरा है

रूठ भले कैसे गाएँगे

रूठ भले कैसे गाएँगे रूठ भले कैसे गाएँगेविलग चंद्रिका से राकेश।रश्मिरथी से बना दूरियाँकब दमके नभ घन आवेश।।नित्य शिलाओं से टकराएबहती गंगा अविरल धारनौकाएँ जल

नेह की बरसात पावन -बाबू लाल शर्मा

नवगीत- नेह की बरसात पावन चाह सागर से मिलन कीपर्वतों से पीर पलती।मोम की मूरत समंदरप्रीत की नदिया मचलती।।नेत्र खोले झाँकता मुखनेह की बरसात पावनदर्द की सौगात

स्वर्ण की सीढ़ी चढी है

स्वर्ण की सीढ़ी चढी है चाँदनी उतरी सुनहलीदेख वसुधा जगमगाई।ताकते सपने सितारेअप्सरा मन में लजाई।।शंख फूँका यौवनों मेंमीत ढूँढे कोकिलाएँसागरों में डूबने

गुलमोहर है गुनगुुनाता

गीत - गुलमोहर है गुनगुुनाता गुलमोहर है गुनगुुनाता,अमलतासी सी गज़ल।रीती रीती सी घटाएँ,पवन की अठखेलियाँ।झूमें डोलें पेड़ सारे,बालियाँ अलबेलियाँ।गीत गाते स्वेद

इक शिखण्डी चाहिए

गीत/नवगीत- इक शिखण्डी चाहिए पार्थ जैसा हो कठिन,व्रत अखण्डी चाहिए।*आज जीने के लिए,**इक शिखण्डी चाहिए।।*देश अपना हो विजित,धारणा ऐसी रखें।शत्रु नानी याद

आज पंछी मौन सारे

आज पंछी मौन सारे नवगीत (१४,१४) देख कर मौसम बिलखताआज पंछी मौन सारेशोर कल कल नद थमा हैटूटते विक्षत किनारे।।विश्व है बीमार या फिरमौत का तांडव धरा परजीतना है

आ बैठे उस पगडण्डी पर

आ बैठे उस पगडण्डी पर आ बैठे उस पगडण्डी पर,जिनसे जीवन शुरू हुआ था।बचपन गुरबत खेलकूद में,उसके बाद पढ़े जमकर थे।रोजगार पाकर हम मन में,तब फूले ,यौवन मधुकर थे।भार