माँ दुर्गा पर सुधा शर्मा के पिरामिड कविता(maa durga)

माँ! रूपा मोहिनी वर दात्रीअरि मर्दनीसंकट हरणी जय जगजननी ।माँ नेह उदधिआल्हादिनी सर्वव्यापिनीमंगल करणीसर्व  दुख हरणी ।माँ सृष्टाब्रम्हाण्ड अतुलित त्रिगुण मयी मारण कारणहे काली कपालिनी।माँ! ज्योति स्वरूपाजगमगचिर उजास परम प्रकाशहे…

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माँ दुर्गा से संबंधित हाइकु-सुधा शर्मा(sudha sharma’s haiku)

देवी मंदिर झिलमिलाते जोतलगी कतारभक्तों की भीड़ मनोभिलाषा रखें माँ के चरणफहरे ध्वज काली पीली रक्तिम माँ के आँगनविभिन्न रूपशक्ति की आराधना आत्म उजासघंटियों संग गूंजते जयकारामाँ शेरावालीमय श्रृंगार शंख चक्र त्रिशूल सिंहवाहिनीखड्ड खप्पर कर शोभित मुद्रा मात कालिकानमन मातेदुर्गे दुख…

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सरसी छंद में रचित कविता ‘विघ्न हरो गणराज’-सुधा शर्मा
गणेश चतुर्थी विशेषांक

सरसी छंद में रचित कविता ‘विघ्न हरो गणराज’-सुधा शर्मा

विघ्न हरो गणराज हे गौरी नंदन हे गणपति,प्रथम पूज्य  महराज। कृपा करो हे नाथ हमारे,विघ्न हरें गण राज।। घना तिमिर है छाया जग में, भटक रहा इंसान।   भूल गया जीवन…

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विश्व पर्यावरण दिवस विशेषांक सुधा के दोहे (Sudha’s dohe based on environmental issues)

धानी चुनरी जो पहन,करे हरित श्रृंगार। आज रूप कुरूप हुआ,धरा हुई बेजार।सूना सूना वन हुआ,विटप भये सब ठूंठ। आन पड़ा  संकट विकट,प्रकृति गई है रूठ।।जंगल सभी उजाड़ कर,काट लिए खुद…

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जीवन के झंझावातों में,श्रमिक बन जाते है(jivan ke jhanjhavato me shramik ban jate hai)

नन्ही नन्ही कोमल कायानिज स्वेद बहाते हैं।जीवन के झंझावातों में,श्रमिक  बन जाते है।हाथ खिलौने वाले  देखो,ईंटों को झेल रहे।नसीब नहीं किताबें इनकोमिट्टी से खेल रहेकठिन मेहनत करते है तबदो रोटी…

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मैं भुंइया अंव(mai bhuiyan aav)

बछर- बछर ले पानी पीएव ,मोर कोरा के सुख ला भोगेव,रोवत हे तुंहर महतारी ,मोर लइका मन अब तो चेतव, सब के रासा -बासा मोर संग,मैं जग के सिरजइया अंव।…

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सुधा शर्मा के वृध्दों पर दोहे (SUDHA SHARMA KE DOHE)

बूढ़ा बरगद रो रहा, सूख गये सब पात।अपनों ने ही मार दी,तन पर देखो लात।।दिया उमर भर आज तक,घनी सभी को छाँह।भूल गये सब कृतज्ञता,काट रहे हैं बाँह।।ढूंढ रहा है…

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सुधा शर्मा के रामनवमी पर दोहे

जनम लिए रघुनाथ हैं,हर्षित जन मन आज।आए जग भरतार हैं,रघुकुल के सरताज।।चैत्र शुक्ल तिथी नवम,शुभ दिन शुभ कर नाम।राजा दशरथ प्राण प्रिय,जनमे रघुवर राम।।राम लखन भरत शत्रुघ्न,ये सब भाई चार।रघुकुल…

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जाऊँ कैसे घर मैं गुजरिया(jau kaise ghar mai gujariya)

नटखट कान्हा ने रंग दी चुनरिया जाऊँ कैसे घर मैं गुजरियानीर भरन मैं चली पनघट को देख ना पाई उस नटखट कोडाली पे बैठा कदंब के ऊपरधम्म से कूदा मेरे पथ पररोकी…

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औरत

*औरत*-------------औरत जानती है विस्तार कोदेखती है संसार कोकभी नन्ही सी बिटिया बनकरकभी किसी की दुल्हन बनकरकभी अपनी ही कोख मेंएक नयी दुनिया को लेकर!नन्ही बिटिया से दादी-नानी का सफर,तय करती…

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