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बात बाल्यकाल की- कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

इस रहने में एक चरित्र के ह्रदय परिवर्तन को दर्शाया गया है जो पहले गुमनामी के अँधेरे में जीवन जीता है |
बात बाल्यकाल की- कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

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बात बाल्यकाल की- कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

बात बाल्यकाल की
चिरपरिचित लाल की

गली के सब बच्चों में
अक्ल के सब कच्चों में
शामिल वह हो गया
बुद्धिज्ञान खो गया

शरारती वह हो गया
मतवाला वह हो गया

पढ़ाई जिसे रास नहीं
पैसे जिसके पास नहीं

मौके वो ढूँढता
जेबों पर हाथ मारता
सामान घर के बेच – बेच
अपनी इच्छायें पूरी करता

धीरे – धीरे वह उच्छंख्ल हो
शरारती वो हो गया
मौके वो न छोडता
कभी बैग चोरी करता
कभी किसी की जेब हरता

इच्छायें अपनी पूरी करता
इच्छाओं ने उसकी उसको
अपराधी कर दिया
मायाजाल बढ़ गया

समय ने फिर मोड़ लिया
अचानक एक घटना घटी
बात उस रात की
सूनसान राह पर
रुकी जब एक कार
लुटेरों ने घेर लिया
बचाओ – बचाओ के शब्दों ने
उसके कानों को सचेत किया

एक अपराधी ने दूसरे अपराधियों को
किसी बेक़सूर पर
करते देख वार
अपनी आत्मा को कचोटा
और मन ही मन सोचा

जिंदगी में मिला है
मौक़ा पहली बार
भुलाके अपने पुराने कर्म
भुलाके अपनी सारी इच्छायें
भुलाके अपने सारे गम
छोड़ अपनी जिंदगी का मोह
टूट पड़ा उन अपराधियों पर
बिजली बन
बचा लाज मानवता की
उसने उस परिवार को बचा लिया
अपने जीवन पर्यंत पापकर्मों को
सत्कर्मों में परिवर्तित कर दिया
उसने दूसरों की सेवा का वचन लिया
सत्कर्म की ओर उसके कदम बढ़े
वह समाज का प्यारा हो गया

सबका दुलारा हो गया

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