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बाबूलाल शर्मा बौहरा के नवगीत

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बाबूलाल शर्मा बौहरा के नवगीत

कहानी मोड़ मन मानस

कहानी मोड़ मन मानस
उदासी छोड़नी होगी।
पिपासा पीर विश्वासी
निराशा भूल मन योगी।।

गरीबी की नहीं गिनती
दुखों का जब पहाड़ा हो
नही बेघर नदी समझो
किनारा तल अखाड़ा ।
वृथा भटको नहीं बादल
विरह पथ दर्द संयोगी।,।

उजाले भूल मन चातक
अँधेरे सिंधु से ले लो
बहे सावन दृगों से ही
अकालों का यजन झेलो
बहे गंगा कठौती में
किसानी श्वेद श्रम भोगी।

बनाले मीत वर्णों को
लिखो हर पीर परिजन सी
बसे परिवार छंदों के
सृजन कविता प्रिया तन स
वियोगी घन उठो बन कर
सृजन संगीत संभोगी।।

नदी की धार सम पर्वत
पराई पीर हरनी है
समंदर प्रीति का खाली
जगत की गंद भरना ।
तपन से भाप बन उड़ना
बरसना खूब घन जोगी।।

दुखों के ताल रीते कर
तलाई बो मिताई की
नहर बाँधों नदी नालों
सनेही मन सिँचाई की ।
मिटा अक्षर अभावों के
सँभलना आज मन रोग।।


✍©
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
बौहरा भवन, सिकंदरा,
दौसा,राजस्थान ९७८२९२४४७९

सूरज उगने वाला है

मीत यामिनी ढलना तय है,
कब लग पाया ताला है।
*चीर तिमिर की छाती को अब,*
*सूरज उगने वाला है।।*

आशाओं के दीप जले नित,
विश्वासों की छाँया मे।
हिम्मत पौरुष भरे हुए है,
सुप्त जगे हर काया में।

जन मन में संगीत सजे है,
दिल में मान शिवाला है।
चीर तिमिर…………. ।

हर मानव है मस्तक धारी,
जिसमें ज्ञान भरा होता।
जागृत करना है बस मस्तक,
सागर तल जैसे गोता।

ढूँढ खोज कर रत्न जुटाने,
बने शुभ्र मणि माला है।
चीर ………………….।

सत्ता शासन सरकारों मे,
जनहित बोध जगाना है।
रीत बुराई भ्रष्टाचारी,
सबको दूर भगाना है।

मिले सभी अधिकार प्रजा को,
दोनो समय निवाला है।
चीर तिमिर……………..।

हम भी निज कर्तव्य निभाएँ,
बालक शिक्षित व्यवहारी।
देश धरा मर्यादा पालें,
सत्य आचरण हितकारी।

शोध परिश्रम करना होगा,
लाना हमे उजाला है।
चीर तिमिर …………..।

✍©
बाबू लाल शर्मा बौहरा
सिकंदरा,दौसा, राजस्थान

आज लेखनी रुकने मत दो


आज लेखनी,रुकने मत दो
गीत स्वच्छ भारत लिखना।
दूजे कर में झाड़ू लेकर,
घर आँगन तन सा रखना।।

आदर्शो की जले न होली
मेरी चिता जले तो जल
कलम बचेगी शब्द अमर कर,
स्वच्छ पीढ़ि सीखें अविरल

रुके नही श्वाँसों से पहले
फले लेखनी का सपना।
आज……………………।।

स्वच्छ रखूँ साहित्य हिन्द का
विश्व देश अपना सारा
शहर गाँव परिवेश स्वच्छ लिख
चिर सपने निज चौबारा

अपनी श्वाँस थमे तो थम ले,
तय है मृत्यु स्वाद चखना।
आज………………………।।

एक हाथ में थाम लेखनी,
मन के भाव निकलने दो
भाव गीत ऐसे रच डालो,
जन के भाव सुलगने दो

खून उबलने जब लग जाए,
बोलें जन गण मन अपना।
आज……………………,।।

सवा अरब सीनों की ताकत,
हर संकट पर भारी है
ढाई अरब जब हाथ उठेंगे,
कर पूरी तैयारी है

सुनकर सिंह नाद भारत का,
नष्ट वायरस, तय तपना।
आज……………………।।

बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
बौहरा भवन
सिकदरा,303326
दौसा,राजस्थान,9782924479

गोरी दर्पण देख रही है

नयन सीप से, दाड़िम दंती,
अधर पंखुरी, खोल सही।
मन मतवाली रेशम चूनर
गोरी .. दर्पण देख रही ।।

झीनी चूनर बणी ठणी सी
नयन कटोरी कजरारी
चिबुक सुहानी, नागिन वेणी
कटि तट झूमर शृंगारी

मोहित हो जाए दर्पण भी
पछुआ शीतल श्वाँस बही
अधर…………………।।

माँग सजी मोती से अनुपम
नथ टीका कुण्डल चमके
जल दर्शी है कंठ सुकंठी
कंठहार झिल मिल दमके

दर्पण क्या प्रति उत्तर देगा
मन मानस में खड़ग गही।
अधर……..।।

कंगन चूड़ी हिना प्रदर्शित
छिपा कभी यौवन अँगिया
लाल गुलाबी नील वर्ण में
यौवन वन महके बगिया

शायद मन नवनीत तुम्हारा
तन की चाहत मथन दही।
अधर………….।।

रात चाँदनी जैसी टिम टिम
धानी चूनर मय लहँगा
प्रीत पायलें कदली पद में
स्वप्न फले सावन महँगा

मन का अवगुंठन तो खोलो
प्रीत रीत की बात कही।
अधर…………………..।।

✍ ©
बाबू लाल शर्मा, विज्ञ
सिकंदरा,दौसा, राजस्थान

शूल से अब प्रीत पलती

भागे भँवरे ताप देखकर
शूल से अब प्रीत पलती।
मरुस्थली का नेह पाकर
विरह की गंगा छलकती।।

गगन भाल की बिंदी रूठी
रात अमावस चमक रही
रंग बहे गंगा की धारा
श्वेत वसन तन दमक रही

पीर विरह में डूब चकोरी
लगती संध्या सी ढलती।
मकरंद……………….।।

सागर में मिल नदिया अपना
बिम्ब खोजती पानी में
ओस जमी सूखी रेती पर
आँसू की मनमानी में

अवगुंठन में सूखी पलकें
आँसू की श्रद्धा छलती।
मकरंद……………….।।

रीत प्रीत आकाशी खेती
संयोगों की आशा है
बरसाती नालो से भू की
बुझती कहाँ पिपासा है

नेह मेह चाहत में वसुधा।
प्रिय घन की माला भजती।
मकरंद………………….।।


बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
बौहरा-भवन
सिकंदरा दौसा राजस्थान

शांत सागर सा हृदय ले

शांत सागर सा हृदय ले
मेघ बैठा नद किनारे।
छंद मन में गुन गुना कर
उम्र सावन की विचारे।।

ले कुहासा भोर जगती
धुंध की चादर लपेटे
मेघ धरती पर उतर कर
साँझ की शैय्या समेटे

बाग की आशा सुलगती
भृंग का पथ रथ सँवारे।
शांत………………..।।

शीत में सावन सरसता
प्रीत की बदरी लुभाए
आग हिय में भर सके वह
पुष्प ही नव गंध लाए

बिजलियों की आस लेकर
चंद्र भी भूला सितारे।
शांत………………।।

नाव बिन माँझी सरकती
रेत की पगडंडियों में
नेह की पतवार बिकती
आसमानी मंडियों में

गीत सुन सुन कर हवाएँ
आँधियों का रूप धारे।
शांंत………………..।।

प्यास से व्याकुल हुआ घन
ओस सुमनो को टटोले
आस भँवरे में जगी है
गीत गा कर मन सतोले

फूल का मन डोल जाता
पंथ तितली का निहारे।
शांत सागर सा हृदय ले
मेघ ..बैठा नद किनारे।।

✍©
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
बौहरा- भवन ३०३३२६
सिकंदरा, जिला-दौसा

राजस्थान ९७८२९२४४७९

बना लेखनी वह कविता


टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।
स्वर दे दो मय भाव सनेही,
बह जाए मन की सरिता।

शब्द शब्द को ढूँढ़ ढूँढ़ कर,
भाव पिरो दूँ मन भावन।
ज्येष्ठ ताप पाठक को भाए,
जैसे रमणी को सावन।
मानव मानस मानवता हित,
छंद लिखूँ भव शुभ फलिता।
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।

बात बुजुर्गों के हित चित लिख,
याद दिला दूँ बचपन की।
बच्चों के कर्तव्य लिखूँ सब,
समझ जगा दूँ पचपन की।
बेटी बने सयानी पढ़ कर,
वृद्धा गाए बन बनिता।
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।

लिखूँ गुटरगूँ युगल कपोती,
नाच उठे वन तरुणाई।
मोर मोरनी नृत्य लिखूँ वन,
बाज बजाए शहनाई।
नीड़ सहेजे चील बया का,
सारस बक संगत चकिता।
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।

चातक पपिहा पीड़ा भूले,
काग करे पिक से यारी।
जंगल में मंगलमय फागुन,
शेर दहाड़ें भयहारी।
भालू चीता संगत चीतल,
रखें धरा को शुभ हरिता।
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।

श्रमिक किसानी पीड़ा हर लें,
ऐसे भाव लिखूँ सुख कर।
स्वेद सुगंधित जग पहचाने,
कहें प्रसाधन विपदा कर।
बने सत्य श्रम के जन साधक,
भाव हरे तन मन थकिता।
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।

राजनीति के धर्म लिखूँ कुछ,
पावन शासक शासन हो।
स्वच्छ बने सत्ता गलियारे,
सरकारें जन भावन हो।
ध्रुव तारे सम मतदाता बन,
नायक चुनलें भल भविता।
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।

प्रीत रीत से पाले जन मन,
खिला खिला जीवन महके।
कटुता द्वेष भूल हर मानव,
मानस मनुज हँसे चहके।
रिश्ते नाते निभें पड़ोसी,
याद करें क्यों नर अरिता।
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।

सोच विकासी भाव जगे भव,
भूल युद्ध बन अविकारी।
कर्तव्यों की होड़ मचे मन,
बात भूल जन अधिकारी।
देश देश में जगे बंधुता,
विश्व राज्य की मम कमिता।
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।

जय जवान लिख जय किसान की,
जय विज्ञान लिखूँ जग हित।
नारी का सम्मान करें सब,
बिटिया को लिख दूँ शुभ चित।
गौ धरती जग मात मान लें,
समझें जग पालक सविता।
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।

सागर नदी भूमि नभ प्राकृत,
मानवता के हित लिख दूँ।
लिख आभार पंख धर का मैं,
कलम शारदे पद रख दूँ।
पहले लिख कर निज मन मंशा,
भाव जगा माँ शुभ शुचिता।
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।

बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*

आज पंछी मौन सारे


देख कर मौसम बिलखता
आज पंछी मौन सारे
शोर कल कल नद थमा है
टूटते बस तट किनारे।।

विश्व है बीमार या फिर
मौत का तांडव धरा पर
जीतना है युद्ध नित नित
व्याधियों का तम हरा कर

छा रहा नैराश्य नभ में
रो रहे मिल चंद्र तारे।
देख कर…………….।।

सिंधु में लहरें उठी बस
गर्जना क्यूँ खो गई है
पर्वतो से पीर बहती
दर्द की गंगा नई है

रोजड़े रख दिव्य आँखे
खेत फसलों को निहारे।
देख कर……………..।।

तितलियाँ लड़ती भ्रमर से
मेल फुनगी से ततैया
ओस आँखो की गई सब
झूठ कहते गाय मैया

प्रीति की सब रीत भूले
मीत धरते शर करारे।
देख कर………….।।

राज की बातें विषैली
गंध मद दर देवरों से
बैर बिकते थोक में अब
सत्य ले लो फुटकरों से

ज्ञान की आँधी रुकी क्यों
डूबते जल बिन शिकारे।
देख कर……………….।।


बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
सिकंदरा,दौसा, राजस्थान

आपके बिन सब अधूरी


कल्पना यह कल्पना है,
आपके बिन सब अधूरी।
गया भूल भी मधुशाला,
वह गुलाबी मद सरूरी।

सो रही है भोर अब यह,
जागरण हर यामिनी को।
प्रीत की ठग रीत बदली,
ठग रही है स्वामिनी को।
दोष देना दोष है अब,
प्रीत की बाजी कसूरी।
कल्पना यह कल्पना है,
आपके बिन सब अधूरी।

प्रीत भूले रीत को जब,
मन भटक जाता हमारा।
भूल जाता गात कँपता,
याद कर निश्चय तुम्हारा।
सत्य को पहचानता मन,
जगत की बाते फितूरी।
कल्पना यह कल्पना है,
आपके बिन सब अधूरी।

उड़ रहा खग नाव सा मन,
लौट कर आए वहीं पर।
सोच लूँ मन मे भले सब,
बात बस मन में रही हर।
प्रेम घट अवरोध जाते,
हो तनों मन में हजूरी।
कल्पना यह कल्पना है,
आपके बिन सब अधूरी।

प्रेम सपन,तन पाश लगे,
यह मन मे रही पिपासा।
शेष जगत में बची नहीं,
अपने मन में जिज्ञासा।
आओ तो जी भर देखूँ,
कर दो मन्शा यह पूरी।
कल्पना यह कल्पना है,
आपके बिन सब अधूरी।
. °°°°°°°
✍©
बाबू लाल शर्मा बौहरा
सिकंदरा दौसा राजस्थान

आज दलदल में फँसे हैं

आज दलदल में फँसे है, प्राण भी!
यह सरल मन चाहता अब, त्राण भी।

तन मन लगा है नयन शर , घाव है!
भटक रहा तन माँझी मन, नाव है!!
चंदा चुभता हिय लगे, कृपाण भी!
आज दलदल में फँसे हैं, प्राण भी!

बैरिन सम ऋतु बासंती, लग रही!
कूँक कोयल बन हलाहल, मन बही!!
पढ़े मन अब चाह गरुड पुराण भी!
आज दलदल में फँसे है, प्राण भी!!

झूठे हृदय ठगे माया, रीति से!
सदा पालता जग रिपुता,प्रीति से!!
लगता है दिल होता पाषाण भी!
आज दलदल में फँसे हैं, प्राण भी!!

✍©
बाबू लाल शर्मा बौहरा
सिकंदरा,दौसा, राजस्थान

पीर जलाए आज विरह फिर

पीर जलाए आज विरह फिर,बनती रीत!
लम्बी विकट रात बिन नींदे, पुरवा शीत!

लगता जैसे बीत गया युग, प्यार किये!
जीर्ण वसन हो बटन टूटते, कौन सिँए!
मिलन नहीं भूले से अब तो, बिछुड़े मीत!
पीर जलाए आज विरह फिर, बनती रीत!

याद रहीं बस याद तुम्हारी, भोली बात!
बाकी तो सब जीवन अपने, खाए घात!
कविता छंद भुलाकर लिखता, सनकी गीत!
पीर जलाए आज विरह फिर, बनती रीत!

नेह प्रेम में रूठ झगड़ना, मचना शोर!
हर दिन ईद दिवाली जैसे, जगना भोर!
हर निर्णय में हिस्सा किस्सा, हारे जीत!
पीर जलाए आज विरह फिर,बनती रीत!

याद सताती तन सुलगाती, बढ़ती पीर!
जितना भी मन को समझाऊँ, घटता धीर!
हुआ चिड़चिड़ा जीवन सजनी,नैन विनीत!
पीर जलाए आज विरह फिर, बनती रीत!

प्रीत रीत की ऋतुएँ रीती, होती साँझ!
सुर सरगम मय तान सुरीली, बंशी बाँझ!
सोच अगम पथ प्रीत पावनी, मन भयभीत!
पीर जलाए आज विरह फिर, बनती रीत!

सात जन्म का बंधन कह कर, बहके मान!
आज अधूरी प्रीत रीत जन, मन पहचान!
यह जीवन तो लगे प्रिया अब, जाना बीत!
पीर जलाए आज विरह फिर, बनती रीत!


✍©
बाबू लाल शर्मा बौहरा
सिकंदरा दौसा राज

पत्थर दिल कब पिघले

लता लता को खाना चाहे,
कली कली को निँगले!
शिक्षा के उत्तम स्वर फूटे,
जो रागों को निँगले!

सत्य बिके नित चौराहे पर,
गिरवी आस रखी है
दूध दही घी डिब्बा बंदी,
मदिरा खुली रखी है!
विश्वासों की हत्या होती,
पत्थर दिल कब पिघले!
लता लता को खाना चाहे
कली कली को निँगले!

गला घुटा है यहाँ न्याय का,
ईमानों का सौदा!
कर्ज करें घी पीने वाले
चाहे बिके घरौंदा!
होड़ा होड़ी मची निँगोड़ी,
किस्से भूले पिछले!
लता लता को खाना चाहे,
कली कली को निँगले!

अण्डे मदिरा मांस बिक रहे,
महँगे दामों ठप्पे से!
हरे साग मक्खन गुड़ मट्ठा,
गायब चप्पे चप्पे से!
पढ़े लिखे ही मौन मूक हो,
मोबाइल से निकले!
लता लता को खाना चाहे,
कली कली को निँगले!

बेटी हित में भाषण झाड़े,
भ्रूण लिंग जँचवाते!
कहें दहेजी रीति विरोधी,
बहु को वही जलाते!
आदर्शो की जला होलिका
कर्म करें नित निचले!
लता लता को खाना चाहे,
कली कली को निँगले!

संस्कारों को फेंक रहे सब,
नित कचरा ढेरों में!
मात पिता वृद्धाश्रम भेजें
प्रीत ढूँढ गैरों में!
वृद्ध करे केशों को काले,
भीड़ भाड़ में पिट ले!
लता लता को खाना चाहे,
कली कली को निँगले!


✍©
बाबू लाल शर्मा बौहरा
सिकंदरा दौसा राजस्थान

सन्नाटों के कोलाहल में

सन्नाटों के कोलाहल में
नदियों के यौवन पर पहरा।
लम्पट पोखर ताल तलैया
सोच रहे सागर से गहरा।।
. १
ज्वार उठा सागर में भारी
लहरों का उतरा है गहना
डरे हुए आँधी अँधियारे
वृक्ष गर्त में ठाने रहना।

मन पंछी उन्मुक्त गगन उड़
वापस नीड़ों में आ ठहरा।
. २
खेत खेत सूखी तरुणाई
मुख पर चीर दुपट्टा बाँधे
काल कहार मसलते देखो
तेल हाथ ले अपने काँधे

जूहू चौपाटी नदिया तट
रक्तबीज का झण्डा फहरा।
. ३
कंचन कामी तरुण कामिनी
लता चमेली मुँह को ढाँपे
प्रेम गली पथ दीवारें तम
शयन कक्ष भी थर थर काँपे

मीत मिताई रिश्ते नाते
रोक पंथ ही पढे ककहरा।
. ४
चौक चाँदनी जंतर मंतर
पगडंडी पथ गलियारों के
घूँघट के पट लगे हुए हैं
माँझी नद खेवनहारों के
लाशें शोर मचाएँ भारी
पुतले देखें दहन दशहरा।
सन्नाटों के…………..।।


बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
बौहरा – भवन, ९७८२९२४४७९
सिकंदरा ,दौसा, राजस्थान ३०३३२६

रूठ भले कैसे गाएँगे

रूठ भले कैसे गाएँगे
विलग चंद्रिका से राकेश।
रश्मिरथी से बना दूरियाँ
कब दमके नभ घन आवेश।।

नित्य शिलाओं से टकराए
बहती गंगा अविरल धार
नौकाएँ जल चीर चीर कर
करे पथिक को नदिया पार
प्राकृत सृष्टा मेल रहे तब
खिलता है नूतन परिवेश।
रूठ…………………..।।

धरा रूठ कर शशि से कैसे
धवल चंद्रिका ओढे नित्य
सागर पर्वत ग्रह पिण्डों को
उर्जा देता है आदित्य
करे नही वे भेद किसी से
सम रखते हर देश विदेश।
रूठ…………………….।।

व्रती चातकी शशि को ताके
व्याकुल उल्लू चीखे रात
चकवा चकवी नित्य बिछुड़ते
करते रहते दिन भर बात
चकमक देता अग्नि तभी जब
संघर्षण हो मीत विशेष।
रूठ………………….।।

छंद रूठ जाए कविता से
जल बिन जीए कैसे मीन
कवि से रूठ लेखनी छिटके
स्वर देगी फिर कैसे बीन
सात स्वरों के इंद्रधनुष को
देख खिले घन श्यामल वेश।
रूठ……………………..।।

मनो मनाओ श्यामल केशी
विलग करो मत वीणा तार
शब्द लेखनी कवि मिल रचिए
नव गीतों से नव संसार
मन में प्राकृत भाव पिरो लो
बिम्ब रहे क्यों कोई शेष।
रूठ………………….।।


बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
सिकंदरा,दौसा,राजस्थान

नेह की बरसात पावन

चाह सागर से मिलन की
पर्वतों से पीर पलती।
मोम की मूरत समंदर
प्रीत की नदिया मचलती।।

नेत्र खोले झाँकता मुख
नेह की बरसात पावन
दर्द की सौगात खुशियाँ
जन्म दृग ले नित्य सावन

पाहनों को चूम कर ही
नीर ले नर्मद निकलती।

मोम के पुतले बुलाते
मौन आँखों के इशारे
नाव बिन माँझी चली है
रेत के सागर किनारे

केश कंटक से चुभे कर
गाल पर गंगा छलकती।

पेड़ से लिपटी लता को
खींच चूमे रेत के कण
आँधियों के ज्वार भाटे
सिंधु थामें आवरण

नासिका की श्वाँस से तप
आह की दरिया झलकती।

जब छुए पाहन हृदय को
मेघ सा मन हिय धड़कता
बन्द आँखो की लपट वन
कौंध नभमंडल कड़कता

मूर्ति से अभिसार करती
जाह्नवी धारा उछलती।
चाह सागर ………….


बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
सिकंदरा,दौसा, राजस्थान


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