KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

बढ़ती जनसंख्या – घटते संसाधन

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बढ़ती जनसंख्या – घटते संसाधन


अशिक्षा ने हमें खूब फसाया,
धर्म के नाम पर खूब भरमाया ।
अंधविश्वास के चक्कर में पड़,
जनसंख्या बढ़ा हमने क्या पाया?

बढ़ती जनसंख्या धरा पर ,
बढ़ रहा है इसका भार।
चहुँ ओर कठिनाई होवे,
होवे समस्या अपरम्पार।

वन वृक्ष सब कटते जाते,
श्रृंगार धरा के कम हो जाते।
रहने को आवास के खातिर,
कानन सुने होते जाते।

जब लोग बढ़ते जाएंगे,
धरती कैसे फैलाएंगे।
सोना पड़ेगा खड़े खड़े,
नर अश्व श्रेणी में आ जाएंगे।

अब तो हॉस्पिटल में भाई,
मरता मरीज नम्बर लगाई।
भीड़ भाड़ के कारण भइया,
कभी कभी जान चली जाई।

उत्तम स्वास्थ्य उत्तम शिक्षा,
नहीं होती अब पूरी इच्छा ।
हर पल हर घड़ी होती बस,
उत्तमता की यहाँ परीक्षा।

स्वच्छ वायु व स्वच्छ पानी,
नहीं बची मदमस्त जवानी ।
कर दी जनसंख्या बढ़करके,
बे रंग धरा का चुनर धानी।


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अशोक शर्मा, कुशीनगर,उ.प्र.
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