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बैल दीवाली -डी कुमार अजस्र (दुर्गेश मेघवाल ,बूंदी /राजस्थान ) विधा -कविता/ पद्य

‘बैल दिवाली ‘ रचना डी कुमार–अजस्र द्वारा बैल (OX)दिवाली ,गोवर्धन पूजा अन्नकूट महोत्सव के संदर्भ में स्वरचित रचना है

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बैल दीवाली

बैल- दीवाली , बिन बैल है खाली ,

आओ मनाएं हम सूनी दीवाली ।

कोना भी सूना है ,आँगन भी रूना है ,

माँ और बेटे की हर बात है खाली ।

कृषक-भाई (बैल ) ठोकर ही खाए है,

कृषक के लिये है कहाँ खुशहाली ।

कम कहीँ नहीँ था ,कमजोर नहीँ था ,

मशीन की तुलना में था बलशाली ।

पर भाई को जान ,इक निरा जानवर ,

किया किसान ने उसे बदहाली ।

कमाई से जिसकी ये भारत पला था ,

आज है बस उसकी कटवाली।

बेटा ही जब कत्लखाने चढ़ा हो ,

करे कौन अब गौमाता रखवाली ।

पुरातन को खोकर नए को है पाला,

उन्नति की चाल अजब मतवाली ।

सौ से घट कर अब साठ रह गयी ,(औसत उम्र)

अब भी कहते हो मशीन निराली ।

खोजो ढूंढो अनुसन्धान करो तुम ,

जो है उसको अब कैसे सम्भाली ।

कृषक फिर से कृष् ही न बन जाए ,

आत्महत्या का वो बने सवाली ।

समय अब भी है संभलो-संभालो ,

‘अजस्र’ दीपावली न हो फिर काली ।

✍✍ *डी कुमार–अजस्र(दुर्गेश मेघवाल,बून्दी/राज)*

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