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बासंती फागुन

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⁠⁠⁠ बासंती फागुन

ओ बसंत की चपल हवाओं,
फागुन का सत्कार करो।
शिथिल पड़े मानव मन में
फुर्ती का  संचार करो।1
बीत गयी है आज शरद ऋतु,
फिर से गर्मी आयेगी.
ऋतु परिवर्तन की यह आहट,
सब के मन को भायेगी।2
कमल-कमलिनी ताल-सरोवर,
रंग अनूठे दिखलाते।
गेंदा-गुलाब टेसू सब मिलकर
इन्द्रधनुष से बन जाते।3
लदकर मंजरियों से उपवन,
छटा बिखेरें हैं अनुपम।
पुष्पों से सम्मोहित भँवरें,
छेड़ें वीणा सी सरगम।4
अमराइयों की भीनी सुगंध सँग
कोकिल भी करती वंदन ।
उल्लासित मतवाले होकर
झूम उठे सबके तन मन।5
बजते ढोलक झांझ-मंजीरे
रचतें हैं इक नव मंजर।
फागुन की सुषमा में डूबे
जलचर ,नभचर और थलचर।6
पीली सरसों है यौवन पर,
मंडप सी सज रही धरा ।
लहराती भरपूर फसल का,
सब नैनों में स्वप्न भरा।।
पाल लालसा सुख-समृद्धि की,
कृषक प्रतीक्षित हैं चँहुं ओर।
योगदान दें राष्ट्र प्रगति में,
सभी लगा कर पूरा जोर।8
प्रवीण त्रिपाठी, 13 मार्च 2019
कविता बहार से जुड़ने के लिये धन्यवाद

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