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बचपन के खिलौनों के बदलते ढंग कविता

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बचपन के खिलौनों के बदलते ढंग कविता

जयतु, जय जवान, जय किसान हो,
जयतु मातृ-भू, जय भारत महान हो।

माटी की खुशबू ले चलो वहाँ-वहाँ,
अपने देश के पहरेदार जहाँ-जहाँ।

वतन में अंधेरा छाया है अब कहाँ ?
रोशन करके गया वह सरहद यहाँ।

नशे में डूब चूके हैं आज के जवान,
कैसै सम्हलेगा देश, सब हैं नादान।

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है ‘आज़ादी’ क्या ? नहीं वो जानते,
मनमर्जी को ‘अपना हक़’ वो मानते।

हुई बहत्तर की अब आज़ादी अपनी,
देखो नेता, बदली है कथनी-करनी।

धरम के ठेकेदारों में छिड़ गई जंग,
बचपन के खिलौनों के बदलते ढंग।

अब जागो, हे शक्ति की प्रबल-धारा,
मचे ताण्डव, बिखेर दो मुण्ड-माला।

चमके सूरज बनके ये भारत अपना,
अखण्ड, अजेय, अभेद्य हो अनुपमा।

-शैलेन्द्र कुमार नायक ‘शिशिर’
सरायपाली, जिला – महासमुंद, छत्तीसगढ़
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