KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

कविता बहार बाल मंच ज्वाइन करें @ WhatsApp

@ Telegram @ WhatsApp @ Facebook @ Twitter @ Youtube

भाग रहे हैं सब – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

इस रचना के माध्यम से जीवन को दिशा देने का एक प्रयास किया गया है |
भाग रहे हैं सब – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

0 50

भाग रहे हैं सब – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

भाग रहे हैं सब
इधर से उधर

चाह में सुनहरे कल की
वर्तमान को घसीटते
आत्मा को कचोटते

चाह पाने की
थोड़ी सी छाँव
धन की लालसा
विलासिता में आस्था
चाह अहम की

पंक्षी बन उडूं गगन में
बिन पंखों के
आधारहीन
चाल के साथ हवा में
भाग रहे हैं सब

इधर से उधर
आत्मा पर कर वार
जी रहे हैं सब
उधार की

जिंदगी के बोझ तले
अज्ञान के
बिन दीये के
रौशनी की चाह में
भाग रहे हैं सब

इधर से उधर
उद्देश्यहीन राह पर
चौसर की बिसात पर
जिंदगी जी रहे सभी
अकर्म की सेज पर चाहते
फूलों के ताज

समझ नहीं आ रहा
हम जा रहे किधर
भाग रहे हैं सब
इधर से उधर

पालना है फूलों से सजा
मोतियों से भरा
गुब्बारे भी दीख रहे
छन – छन करता
हाथ में खिलौना
पर आधुनिक
माँ के स्तन को टोह रहा
झूले का बचपन
जा रहा हमारा समाज किधर
भाग रहे हैं सब
इधर से उधर

समय की विवशता
ऊँचाइयों को छूने
का निश्चय
एक ही कदम में
अनगिनत सीढियां नापते
कदम अनायास ही
गिर जाने को
मजबूर करते हैं

अस्तित्व खो संस्कारों
को धो
क्या पाना चाहता है
मानव
मानव दौडता है
केवल दौडता ही
रह जाता है

इधर से उधर
भाग रहे हैं सब
इधर से उधर
जीवन अर्थ समझना है
तो धार्मिक ग्रंथों
की खिड़कियाँ खोल
दिव्य दर्शन ,
स्वयं दर्शन
करना होगा
दिव्य विभूतियों
के चरणों का
आश्रय पाना होगा
संस्कृति
व संस्कारों को
जीवंत बनाना होगा

छोड़ राह
भागने की
इधर से उधर
जीवन से
विलासिताओं को
हटाना होगा
स्थिर होना होगा
संतुष्टि, संयम के साथ
स्वयं को संकल्पों
से बाँधना होगा
निश्चयपूर्ण जीवन
जीना होगा
श्रेष्ठ जीवन
राह निर्मित
करना होगा

मनुष्य को
मशीन की बजाय
मानव बनना होगा
मानव बनना होगा

You might also like
Leave A Reply

Your email address will not be published.