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भाषाओं के अतिक्रमण

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भाषाओं के अतिक्रमण

सर्वनाम से पूछ रहे हैं, संज्ञा नाम कहाँ जाएँ…
भाषाओं के अतिक्रमण में, हिंदी धाम कहाँ पाएँ…

स्वर व्यंजन के मेल सुहाने, संयुक्ताक्षर देते हैं।
वर्ण-वर्ण की संधि देखिये, नव हस्ताक्षर देते हैं।
हिंदी की बिंदी को देखो, अनुस्वार है छोटा सा।
अर्ध चंद्र अनुनासिक मानों, काजर आँजे मोटा सा।

साधारण से मिश्र वाक्य अब, पूर्ण विराम कहाँ जाएँ…
भाषाओं के अतिक्रमण में, हिंदी धाम कहाँ पाएँ…

लुप्त हो रहे नामों को अब, कविता ही अपनाती है।
काव्य जगत में उपनामों को, कुण्डलियाँ महकाती है।
छंदों के बन्धों से सजती, शब्द प्रभाव बढ़ाती है।
अलंकार श्रृंगार करे तो, नव उपमा गढ़ जाती है ।

हिंदी में जो साधक बनता, वह विश्राम कहां पाये…
भाषाओं के अतिक्रमण में, हिंदी धाम कहाँ पाएँ…
सिद्ध पुरोधा के नामों की, हिंदी ही महतारी है।
कला भाव सह लोचकता है, हर भाषा में भारी है।
“मृदुल” करे करबद्ध निवेदन, अब हिंदी की बारी है।
नाम कमाओ इस भाषा में, हिंदी ही सरकारी है।

नाम अमर कर लें जग में हम, नेह प्रणाम सदा पाएँ….
भाषाओं के अतिक्रमण में, हिंदी धाम कहाँ पाएँ…

==डॉ ओमकार साहू मृदुल 07/10/20==

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