KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

भेंट भारत माता से

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भेंट भारत माता से

भारत माता ओढ़ तिरंगा
आज स्वप्न में आई थी
नीर भरा आँखों में मुख पर
गहन उदासी छाई थी
मैंने पूछा हम हुए स्वतन्त्र
क्यों मैला वेश बनाया है
आँखों की दृष्टि हुई क्षीण
क्यों दुर्बल हो गयी काया है
माँ फूट पड़ी फिर बिलख उठी
तब अपने जख्म दिखाए हैं
मैं रही युवा परपीड़ सह
बन दासी न धैर्य कभी टूटा
पर आज जख्म गम्भीर बने
निज सन्तानों ने है लूटा
ये कैसा शासन बना आज
मेरे बच्चों को बाँट रहा
जाति धर्म के नाम पर देखो
मेरी शाखायें काट रहा
सुरसा सा मुँह फैला करके
सब कुछ ही हजम कर जाएगा
कर दिया विषैला जन मन को
बन सहस फणी डस जाएगा
अब नहीं शेष क्षमता इतनी
पीड़ा और सहूँ कैसे?
अब सांस उखड़ती है मेरी
बोलो खुशहाल रहूँ कैसे?
मैंने निःस्वास भरी बोली
माँ शपथ तुम्हें दिलवाती हूँ।
गरज ओज हुँकार भरी
निज कलम असि को चलाती हूँ।
बन मलंग खँजड़ी हाथ पकड़
जनओज की अलख जगाती हूँ।
ये कलम करेगी वार बड़े
हर बला की नींव हिला देगी।
मरहम बनकर माता तेरे
सारे सन्ताप मिटा देगी।


वन्दना शर्मा
अजमेर।

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