बना है बोझ ये जीवन कदम


(मुज़तस मुसम्मन मखबून)
बना है बोझ ये जीवन कदम थमे थमे से हैं,
कमर दी तोड़ गरीबी बदन झुके झुके से हैं।
लिखा न एक निवाला नसीब हाय ये कैसा,
सहन ये भूख न होती उदर दबे दबे से हैं।
पड़े दिखाई नहीं अब कहीं भी आस की किरणें,
गगन में आँख गड़ाए नयन थके थके से हैं।
मिली सदा हमें नफरत करे जलील जमाना,
हथेली कान पे रखते वचन चुभे चुभे से हैं।
दिखी कभी न बहारें मिले सदा हमें पतझड़,
मगर हमारे मसीहा कमल खिले खिले से हैं।
सताए भूख तो निकले कराह दिल से हमारे,
नया न कुछ जो सुनें हम कथन सुने सुने से हैं।
सदा ही देखते आए ये सब्ज बाग घनेरे,
‘नमन’ तुझे है सियासत सपन बुझे बुझे से हैं।


बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’
तिनसुकिया

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