चलो,चले मिलके चले – रीतु प्रज्ञा


विषय-चलों,चले मिलके चले
विधा-अतुकांत कविता

*चलो,चले मिलके चले*


ताली एक हाथ से
नहीं बजती कभी
चलने के लिए भी
होती दोनों पैरों की जरूरत
फिर तन्हा रौब से न चले,
चलो,चले मिलके चले।
शक्ति है साथ में
नहीं विखंड कर सकता कोई
करता रहता जागृत
सोए आत्मा को
हरता प्रतिपल
उदासीपन, असहनीय दर्द को
छोड़ साथियों को यारा
न पथ पर बढ़ चले
चलो, चले मिलके चले
होती है विजयक शंखनाद
अवनि-अंबर तक
एकजुटता के स्वर की
सागर भी मचलता
देख भक्तो की संगम
जो बहती कलकल प्रफुल्लित
न लोभ की सरिता में
डुबाते स्वंय को चले,
चलो,चले मिलके चले।
रीतु प्रज्ञा
दरभंगा, बिहार

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