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छू लेंगे हम आसमान – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

इस रचना में कवि खुद को बुलंद कर मंजिल छू लेने को प्रेरित कर रहा है |
छू लेंगे हम आसमान – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

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छू लेंगे हम आसमान – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

छू लेंगे हम आसमान
कर्तव्य को सीढ़ी बनाकर
बह चलेंगे पवन की तरह
दूर उस आसमान की ओर

छू लेंगे हम आसमान

चिलचिलाती धूप हो या
हो सुबह का सफर
थाम कर बाहें गगन की
चूम लेंगे हम आसमान

छू लेंगे हम आसमान

सागर का फिर जलजला हो
या हो गर्म हवाओं की लहर
चीर कर सीना सभी का
हम आगे बढते जायेंगे

छू लेंगे हम आसमान

गाँधी हो या फिर सुभाष
चलते उनके विचारों के साथ
पाताल के सीने में खंजर उतार
ज्ञान रुपी हीरे हम ढूंढ लायेंगे

छू लेंगे हम आसमान

सबने कहा आसमान से
तारे तोडना है असंभव
हम तो चाँद चूम बैठे
तारों की क्या बात है

छू लेंगे हम आसमान

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