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चौपइया छंद “राखी” बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’

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(चौपइया छंद)

पर्वों में न्यारी, राखी प्यारी, सावन बीतत आई।
करके तैयारी, बहन दुलारी, घर आँगन महकाई।।
पकवान पकाए, फूल सजाए, भेंट अनेकों लाई।
वीरा जब आया, वो बँधवाया, राखी थाल सजाई।।

मन मोद मनाए, बलि बलि जाए, है उमंग नव छाई।
भाई मन भाए, गीत सुनाए, खुशियों में बौराई।।
डाले गलबैयाँ, लेत बलैयाँ, छोटी बहन लडाई।
माथे पे बिँदिया, ओढ़ चुनरिया, जीजी मंगल गाई।।

जब जीवन चहका, बचपन महका, तुम थी तब हमजोली।
मिलजुल कर खेली, तुम अलबेली, आए याद ठिठोली।।
पूरा घर चटके, लटकन लटके, आंगन में रंगोली।
रक्षा की साखी, है ये राखी, बहना तुम मुँहबोली।।

हम भारतवासी, हैं बहु भाषी, मन से भेद मिटाएँ।
यह देश हमारा, बड़ा सहारा, इसका मान बढ़ाएँ।।
बहना हर नारी, राखी प्यारी, सबसे ही बँधवाएँ।
त्योहार अनोखा, लागे चोखा, हमसब साथ मनाएँ।।


*चौपइया छंद* विधान:-

यह प्रति चरण 30 मात्राओं का सममात्रिक छंद है। 10, 8,12 मात्राओं पर यति। प्रथम व द्वितीय यति में अन्त्यानुप्रास तथा छंद के चारों चरण समतुकांत। प्रत्येक चरणान्त में गुरु (2) आवश्यक है, चरणान्त में दो गुरु होने पर यह छंद मनोहारी हो जाता है।
इस छंद का प्रत्येक यति में मात्रा बाँट निम्न प्रकार है।
प्रथम यति: 2 – 6 – 2
द्वितीय यति: 6 – 2
तृतीय यति: 6 – 2 – 2 – गुरु

बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’
तिनसुकिया

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