दादा जी के संग में

दादा जी के संग में

दादा जी के संग में , इस जीवन के ज्ञान ।
मेरे सच्चे मित्र सम ,जाते हैं मैदान ।।
जाते हैं मैदान ,खेल वो मुझे सिखाते ।
प्रेरक गहरी बात , कहानी रोज सुनाते ।।
कह ननकी कवि तुच्छ , बताते है मर्यादा ।
सबसे ज्यादा वक्त , दिया करते हैं दादा ।।
दादा बनकर घूमता , रहा लफंगा यार ।
फँसे बुराई पाश में , परेशान परिवार ।।
परेशान परिवार , मुहल्ला त्रस्त हमेशा ।
हो अनिष्ट जो बात , लिप्तता का अंदेशा ।।
कह ननकी कवि तुच्छ , बुरा ही सदा इरादा ।
नहीं मानते बात , वही बनते हैं दादा ।।
दादा ने दी सीख जो ,  आज तलक है याद ।
वही ज्ञान की पोटली , करते हैं इमदाद *।।
करते हैं इमदाद , सहारा देते अक्सर ।
आते हैं सब याद , गये वो अच्छे अवसर ।।
कह ननकी कवि तुच्छ , चाहते मुझको ज्यादा ।
सारी बीती बात , बताते प्यारे दादा ।।
* मदद
                     —- रामनाथ साहू ” ननकी “
                                   मुरलीडीह
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