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धरा पर आज भी ईमान बाकी है – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

इस कविता के माध्यम से इंसानियत को जीवंत बनाए रखने का प्रयास किया गया है |
धरा पर आज भी ईमान बाकी है – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

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धरा पर आज भी ईमान बाकी है – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

धरा पर आज भी
ईमान बाकी है
धरा पर आज भी
इंसान बाकी है

यदि ऐसा नहीं होता
तो भोपाल त्रासदी देख
मन सबका रोता क्यों
धरा पर आज भी
ईमान बाकी है

धरा पर आज भी
इंसान बाकी है
यदि ऐसा नहीं होता
तो सुनामी देख
मन सबका रोता क्यों
धरा पर आज भी
ईमान बाकी है

धरा पर आज भी
इंसान बाकी है
यदि ऐसा नहीं होता
तो लातूर का विनाश देख
मन सबका रोता क्यों
धरा पर आज भी
ईमान बाकी है

धरा पर आज भी
इंसान बाकी है
यदि ऐसा नहीं होता
तो म्यामार का आघात देख
मन सबका पसीजा क्यों
धरा पर आज भी
ईमान बाकी है

धरा पर आज भी
इंसान बाकी है
यदि ऐसा नहीं होता
तो गाजापट्टी में नरसंहार देख
मन सबका व्याकुल होता क्यों
धरा पर आज भी
ईमान बाकी है

धरा पर आज भी
इंसान बाकी है
यदि ऐसा नहीं होता
तो मंदिरों में भीड़ का
अम्बार नहीं होता
मंत्रोच्चार नहीं होता

मस्जिद में अजान
सुनाई न देती
CHURCH में घंटों की आवाज
सुनाई न देती
गुरुद्वारों में पाठ
सुनाई न देता
मानव के हाथ
दुआ के लिए
न उठ रहे होते
गरीबों का कोई
सहाई न होता
यदि ऐसा नहीं होता
तो धरती पर
कोई किसी की बहिन नहीं होती
कोई किसी का भाई नहीं होता
धरा पर आज भी
ईमान बाकी है

धरा पर आज भी
इंसान बाकी है
गिरते को कोई
उठा रहा न होता
बहकते को कोई
संभल न रहा होता
ये मानव की नगरी है
यहाँ देवों का वास होता है
ये संतों की नगरी है
यहाँ संतों का वास होता है

धरा पर आज भी
ईमान बाकी है
धरा पर आज भी
इंसान बाकी है

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