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धर्मांधता पर कविता

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धर्मांधता पर कविता

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जब भी
बंटा है वतन
तब-तब
बंटवारे के लिए
उत्तरदायी रही है
धर्मांधता
यह चलती है
राजनीतिक इशारों पर
जो आज भी है
पूरे यौवन पर
जाने और कितने
टुकड़े करना चाहते हैं
धर्मांध लोग
इस वतन के
नहीं लेते सबक
ऐतिहासिक भूलों से
और कर रहे हैं निर्माण
अराजक वातावरण का

-विनोद सिल्ला©

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