छत्तीसगढ़ी कविता

टेचराही….(व्यंग) दिन आगे कइसा

टेचराही….(व्यंग) दिन आगे कइसा

गोरर-गोरर के
जिनगी सही
चलत हे नेट,
महिना पुट
भरे परथे
भरे झन पेट।

दु दिन आघु
मटकत रहिथे
आरो मोबाइल म
फोन आथे छोकरी के
कहिथे ,स्टाइल म।

जल्दी भरवा लो
आपके सेवा
हो जाही बंद,
कसके लेवव
फेसबुक, वाट्सअप
के आनंद।

मरता
का न करता
लगा थे जुगाड़,
लइका के
फीस पटे झन पटे
हो भले आड़।

मुड़ खुसारे
नटेरे आँखी
अंगरी चलत हे,
निसा धरे
लत परगे
रात-दिन कलत हे।

चुहक डरिस
नेट वाला
मंगलू के पइसा,
बिन सुवारी
रही जही
दिन आगे कइसा।।


धनराज साहू

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