दीया बन प्रकाश करे-मदन सिंह शेखावत ढोढसर

[26/10/2019, 08:19] Madan Singh:

होडा होड म मर रिया,म्हारा भाई लोग।
समझाया माने नही,फैला अणुतो रोग।
फैला अणुतो रोग,होड म गोडा कुटीजे।
किणकी करले होड,लैणो ले भात भरिजे।
कवै मदन समझाय,होड तो घाले फोडा।
मत कर भाया होड,मर रिया होड म होडा।।

मदन सिंह शेखावत ढोढसर स्वरचित
[28/10/2019, 19:43] Madan Singh:
कुण्डलिया छन्द

दीया बन प्रकाश करे, हटाए अंधकार ।
जग मे सुन्दर काम कर,कुसमित हो संसार ।
कुसमित हो संसार ,अन्धेरा रह न पाये।
ज्ञान की लौ लगाय,तिमिर को दूर भगाये।
कहै मदन कविराय, संसार से खुब लीया ।
सुन्दर करके काज,जले खुद बनकर दीया।।

मदन सिंह शेखावत ढोढसर स्वरचित
[8/11/2019, 15:30] Madan Singh:
“कुंडलिया”

जीवन मे उत्साह हो,घर घर मंगलाचार ।
तभी सार्थक दिपावली,बदले सब व्यवहार।
बदले सब व्यवहार,मदद के हाथ बढाये।
खुशियो का उपहार, दीन के घर पहुचाये
कहै मदन कविराय,खुशिया बहुत है मन मे।
मिल कर सभी मनाय, बांटले सब जीवन मे।

मदन सिंह शेखावत ढोढसर स्वरचित
[25/11/2019, 06:09] Madan Singh:
कुंडलिया

सुन्दर सपने देख कर,काम करे भरपूर ।
साख बने व काज सफल,दुनिया से हो दूर।
दुनिया से हो दूर,मेहनत विफल न होवे।
रात दिन लगा काम,ख्वाब पूरे कर लेवे।
कहै मदन कविराय,सोचले तुम हित अपने।
प्रभू भी देवे साथ,सफल हो सुन्दर सपने।

मदन सिंह शेखावत ढोढसर स्वरचित
[25/11/2019, 14:00] Madan Singh: “कुंडलिया”

मृदु भाषी जो मित्र हो,लेता मन को मोह।
हर जन ह्रदय निवास कर,करे न उससे द्रोह।।
करे न उससे द्रोह,नेह की डोरी बाधो।
दुख सुख मे दे साथ,काम हर कोई साधो।
कहै मदन कविराय, सांच जो प्रीत निभासी
हरदम बढसी नेह, मित्र जो हो मृदु भाषी ।।

मदन सिंह शेखावत ढोढसर स्वरचित
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[26/11/2019, 19:46] Madan Singh:
कुंडलिया
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✍ मदन सिंह शेखावत ढोढसर कृत
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आसी बादल सांतरा ,उमङ घुमङ कर जोर।
बरसण लागे मोकलो हरष हुयो चहुओर ।।
हरष हुयो चहुओर,हल थाम्या सब सोवणी।
अपने अपने खेत,लाग्या किरसा बोवणी।।
कहे मदन कविराय,बरस्यां ही सुख पासी।
बादल खुशिया बांट , हरष बढावता आसी।।
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[5/12/2019, 20:22] Madan Singh:
कुंडलिया

सादा जीवन राखिये,करे दिखावा दूर।
होड किसी की कर नही,क्यू होये मगरूर।।
क्यू होये मगरूर, शान्ति से जीवन जीये।
आपा घापी छोड,काम सब सुन्दर होये।
कहै मदन कविराय, करे अपने से वादा।
प्रभु का करके ध्यान,सदा जी जीवन सादा।।

माया के वशीभुत हो, किया न हरि में भाव।
माया ठगनी ठग रही, जीवन लगता दाव।
जीवन लगता दाव,कोई जन समझ पाते।
उलझा माया फेर, धूमिल बुद्धि हो जाते।
कहै मदन कविराय,सोचकर चल रे भाया।
माया ठगनी जीव,जाल मे फस मत माया।।

मदन सिंह शेखावत ढोढसर स्वरचित
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[14/12/2019, 08:56] Madan Singh: “कुण्डलिया”

जीना सीखो जिन्दगी,
पर हित पर उपकार।
प्रभु परकर विश्वास जी,
नैया कर ले पार।
नैया कर ले पार,
प्रभू का ध्यान लगाये।
संकट हर सी आय,
प्रेम का दीप जलाये।
कहै मदन कविराय,
प्रभु ने बुद्धि जो दीना।
रोज करे शुभ काम,
दीन हित सीखे जीना।

मदन सिंह शेखावत ढोढसर स्वरचित।
[26/12/2019, 16:40] Madan Singh: “कुण्डलिया”

दुखिया के दुख टालना,
हे मेरे भगवान।
बार बार बिनती करू,
बनी रहे यह शान।
बनी रहे यह शान,
बुद्धि नित सच्ची देना।
करूँ यही अरदास,
सीख दुश्मन से लेना।
कहै मदन कविराय,
प्रभू करता है सुखिया।
हरदम रख हरि ध्यान,
नही होने दे दुखिया।।

दाता के आशीष से,
आये इस संसार।
कर्ज उतारो मिल सभी,
सेवा व्रत को धार।
सेवा व्रत को धार,
दीन हित उम्र बिताना।
जीवन है दिन चार,
भाग्य का साथ निभाना।
कहै मदन कविराय,
जोड़ ले प्रभु से नाता।
मानव जीवन सार,
देखता सब कुछ दाता।।

आया समय चुनाव का,
द्वार भावि सरपंच।
घर घर दस्तक दे रहे,
सजा रहे नव मंच।
सजा रहे नव मंच,
आम जन को बहकाये।
होगा खूब विकास,
सपन ऐसे दिखलाये।
कहै मदन कविराय,
गीत खुद के ही गाया।
जीते शक्ल छिपाय,
जीतने ही तो आया।।

मदन सिंह शेखावत ढोढसर स्वरचित
[31/12/2019, 10:29] Madan Singh:
कुण्डलिया

बीता वर्ष प्रसन्न हो ,गये दिवस सब रात।
चुटकी मे यू बीतता,मानो कल की बात।
मानो कल की बात,गजब की मौज मनायी।
खुशियो की सौगात,चहककर झटपट आयी।
कहै मदन कर जोड़, अंत में जाना रीता।
करले अच्छे काज, समय पल पल मे बीता।।

मदन सिंह शेखावत ढोढसर स्वरचित
[13/1, 19:34] Madan Singh:
“कुण्डलिया”

चुनना राहे प्रेम की,कांटे लेय बुहार।
सीधा साधा चल सदा,आये तभी निखार ।।
आये तभी निखार,सुगम जीवन हो जाये।
करिये सुन्दर काज,जगत मे नाम कमाये।
कहै मदन कर जोर, नित्य सपने तू बुनना।
जन सेवा अपनाय,राह सीधी है चुनना।

मदन सिंह शेखावत ढोढसर
[16/1, 09:21] Madan Singh:
“कुण्डलिया”

दुखिया इस संसार मे,सुखी न देखा कोय।
कोई है तन से दुखी,मन से हर जन होय।
मन से हर जन होय,रोग मानस का पाला।
करके खोटे काम,स्वयं दुख की पी हाला।
कहै मदन कविराय,दास हरिका है सुखिया।
कर के मन सन्तोष, नही कब रोवे दुखिया।।

मदन सिंह शेखावत ढोढसर

[18/1, 08:06] Madan Singh:
“कुण्डलिया”

त्यागें सभी कुरीतियाँ,बदल समय अनुसार।
वरना फिर पछतायँगे, जीवन हो निस्सार ।
जीवन हो निस्सार,समय की कीमत जाने।
कर ले सुन्दर काज, आपको दुनिया माने।
कहै मदन कर जोर, सत्य तो कड़वा लागे।
काम करो अब सोच, बुराई सब ही त्यागे।।

मदन सिंह शेखावत ढोढसर
[20/1, 09:53] Madan Singh:

आशा पर जीवन चले,होवे नही निराश।
डटा हुआ संसार है,कभी न त्यागे आस।
कभी न त्यागे आस,सफल जीवन हो जाये।
प्रभु पर रख विश्वास,कभी आफत ना आये।
कहै मदन कर जोर,नही बीते अब सांसा।
अच्छा कर ले काम, कभी ना छोडे आशा।

मदन सिंह शेखावत ढोढसर
[27/1, 10:43] Madan Singh:
पावन रख जनतंत्र को,सखा निभाना साथ।
करे देश हित वोट सब,लेय हाथ मे हाथ।
लेय हाथ मे हाथ,देश हित सोच बनाये।
राष्ट्र करे सम्मान,इसी का मान बढाये।
कहै मदन कर जोर, देश में आवे सावन।
अच्छी हो सरकार, कर्म करने सब पावन ।।

मदन सिंह शेखावत ढोढसर
[27/1, 20:53] Madan Singh:

ताका झांका मत करो निजता करे न भंग।
खोटा पड़े स्वभाव जी,बिगड़े संग कुसंग।
बिगड़े संग कुसंग,दशा जीवन की बिगड़े।
अच्छा रखो स्वभाव,काम हो सब ही तगड़े।
कहै मदन समझाय, ईश की सत्य पताका।
बने आपकी साख,करे क्यू ताका झाँका।।

मदन सिंह शेखावत ढोढसर

[30/1, 20:29] Madan Singh:
“कुण्डलिया”

गुरू कुम्हार एक से,घड़ घड़ काडे खोट।
सुन्दर रचना के लिए,करे चोट पर चोट।
करे चोट पर चोट,शिष्य को खूब तपाये।
नेकी पाठ पढाय ,सत्य की राह बताये।
कहै मदन कविराय,बातपर कर अमल शुरू।
होगा भव से पार, मिल जाये पूरा गुरू।।

मदन सिंह शेखावत ढोढसर स्वरचित
[8/2, 12:49] Madan Singh:
” कुण्डलिया ”

माया सारा जग ठगे, कोई बचना पाय।
उलझाए संसार मे , दुख दरिद्र ही भाय।
दुख दरिद्र ही भाय, कर्म अच्छे कर मनवा।
होगा तव कल्याण,भाग मत पीछे धनवा।
कहै मदन कविराय, यही से सब कुछ पाया।
रहना है संसार, पार पाले तू माया ।।

मदन सिंह शेखावत ढोढसर
[11/2, 19:37] Madan Singh:
“कुण्डलिया”

आये हो संसार मे, नेक काम कर जाय।
विपदा आफत टाल कर,सब की करे सहाय।
सब की करे सहाय,प्रभु ने लायक बनाया।
मेहर उस की होय,खुशिया जी भर लुटाया।
कहै मदन कर जोर, यही से सब कुछ पाये।
दाता को लौटाय, नाम करने तुम आये।।

मदन सिंह शेखावत ढोढसर
[19/2, 12:29] Madan Singh:
कुण्डलिया

आया ॠतु बसंत सखी,चहक रहा मन मोर।
आंगन छायी मस्तिया,करे पखेरू शोर।
करे पखेरू शोर, झूमके नाचे गाये।
करते सब हुडदंग,मस्तिया सब ओर छाये।
कहै मदन कविराय,बसंत नव जीव लाया।
रचना कर संसार,फिर ॠतुराज है आया।।

मदन सिंह शेखावत ढोढसर
[23/2, 12:00] Madan Singh:
“कुण्डलिया”

बसन्ती रंग मे रंगा , भेजा फूल गुलाब ।
हमने यह कबूल किया,मन मे अति ऊबाल।
मन मे अति ऊबाल,लगा अंग अंग महके।
मदन हुआ मदमस्त,खुशीया से सब चहके।
कहै मदन कविराय,नाचती सति सतवन्ती।
फागुन मे हो मस्त,रंग महकाय बसन्ती ।।

मदन सिंह शेखावत ढोढसर स्वरचित
[2/3, 06:03] Madan Singh: “कुण्डलिया”

सुन्दर उत्सव की छटा,आयी फागुन मास।
बैर भाव को भूल कर,मिल जुल रहना पास।
मिल जुल रहना पास,खुशी साझा मनवाना।
होली का त्योहार, चटक रंग खूब लगाना।
कहै मदन कर जोर,आस छायी मन अंदर।
नाच रहे मन मस्त,फाग में सब जन सुन्दर।।

मदन सिंह शेखावत ढोढसर
[9/3, 15:18] Madan Singh:

होली के इस पर्व पर, मेटे सब मतभेद।
भूल गिला शिकवा सभी, खूब जताये खेद।
खूब जताये खेद, शिकायत रह क्यों पाये।
आपस मे रह प्रेम, उसे भूले कब जाये।
मदन कहै समझाय,खुशी की भर दे झोली।
जीवन हो मद मस्त, प्यार की खेलें होली।।

मदन सिंह शेखावत ढोढसर स्वरचित

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मदनसिंह शेखावत

मदन सिंह शेखावत ढोढसर पिता का नाम :- स्व श्री इन्द्र सिंह शेखावत माता का नाम:- श्रीमती सरताज कंवर पत्नी का नाम:- श्रीमती किरण कंवर लेखन:- कविता छन्द गीत दोहा चौपाई कुण्डलिया व अन्य । शिक्षा :-हायर सेकंडरी पास पुरस्कार :- प्रजातंत्र का स्तंभ द्वारा दो बार प्रथम व एक बार द्वितीय सम्मान । साझा संकलन तीन व पत्र पत्रिका मे प्रकाशित रचनाये । पता :- मदन सिंह शेखावत मुकाम पोस्ट :- ढोढसर वाया गोविन्दगढ जिला जयपुर (राजस्थान ) मोबाईल नम्बर 9602142879

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