मनीभाई नवरत्न के दोहे

1)
मित सुख दे भ्राता- पिता , सपूत भी सुख दे मित।
सुखी होती  वो नारी ,   जो सुख दे पति नित।।
2)
धन संचय कर ना साधु ,धन का नहि होती ठौर।
आज इसके पास है ,कल हो जाए किसी और।।
3)
धन की महिमा है बड़ी, धन से ही विपदा टरे।
धन नहीं आज तेरे संग ,कल को तू भूख मरे।।
4)
आगे बढ़ने की चाह में, टांग खींचे जो कोय।
आगे बढ़ लें कोई औरन और वो पीछे होय।।
5)
जो दिखे सो बिके हैं ,अजब खेल रे माया का ।
मन को देखे ना कोई, ध्यान रहे सबको काया का ।
6)
सब चाहै उड़ने आसमां में, चाहे ना कोई जमीं ।
जिस दिन पर टूटेंगे , गिरेंगे इसी जमी।
7)

तन के सुखै सुख है मन के सुख है सुख।
धन के सुखै  सुख नहि मिटे कभी ना भूख ।

8)
जस पावे तन खावै जस खावै तस गावै।
कपटी मन गावै नहि, पर के ही नित खावें ।

9)
समय जो आया सो जाएगा, समय की ना यारी ।
आज तेरे जो संग है , कल रहेगी उसकी बारी ।

10) खुदा खुदा तो सब कहे, खुदा को जाने ना कोय।
जब मन खुदा जान गया, दीन कभी ना रोय।


by

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *