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दुर्गा चंडी काली हो

दुर्गा चंडी काली हो

भारत भू के माथे की तुम,रोली कुमकुम लाली हो।
फल फूलों से लदी हुई तुम,ही तो सुरभित डाली हो।
जीवनभर दुख पीड़ा सहकर,कभी नहीं उफ कहती हो।
मगर जहाँ तलवार थाम लो,दुर्गा चंडी काली हो।

स्वर्ग बना सकती हो,घर की तुम्हीं जरूरत हो।
माँ बहनों की पुण्य रूप में,तुम ममता की मूरत हो।
जननी हो तुम हर पुरुषों की,तुम ही जन्म कहानी हो।
कथा सुनाने हर बालक को,तुम्हीं दादी नानी हो।
पैजनियाँ छनकाने वाली,बिटिया भोली भाली हो।
मगर जहाँ तलवार थाम लो,दुर्गा चंडी काली हो।

अन्नपूर्णा रूप में तुम ही,इस दुनिया की पालक हो।
तुम से ही बगिया सुरभित है,तुम ही सुख संचालक हो।
नींद नहीं आती जब हमको,लोरी तुम्हीं सुनाती हो।
पुष्ट बनाती हो बालक को,क्षीर सुधा बरसाती हो।
तुम ही तो इस पुण्य धरा की,जल जंगल हरियाली हो।
मगर जहाँ तलवार थाम लो,दुर्गा चंडी काली हो।

तुम ही तो सीमा में जाकर,बंदूक तोप चलाती हो।
ऋण वाले डिग्री में तुम भी,अपनी हाड़ गलाती हो।
नहीं अछूता किसी क्षेत्र में,जहाँ तुम्हारा नाम नहीं।
कलम चलाने से यानों तक,पथ में कहीं विराम नहीं।
तुम ही सुख सुमता हो मन की,और तुम्हीं खुशहाली हो।
मगर जहाँ तलवार थाम लो,दुर्गा चंडी काली हो।

डिजेन्द्र कुर्रे “कोहिनूर”

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