KAVITA BAHAR
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नये तराने – माधुरी मुस्कान ग़ज़ल

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नये तराने – माधुरी मुस्कान ग़ज़ल

करीब आओ न दूर जाओ मुझे गले से सनम लगा लो।
न जी सकेंगे न मर सकेंगे जहाँ भी हो तुम हमे बुला लो ।।

अभी अभी तो बहार देखी नये तराने मचल रहे हैं
अभी उजालों ने आँख खोली चलो न खुशियों को भी मना लो ।

मुझे नज़र से निहाल कर दो मैं ख्वाब में भी तुम्हें सवारूँ
जिधर चलोगे मैं साथ दूँगी मेरी वफ़ा को भी तुम भुना लो ।।

ये आशिकी बन्दगी तुम्हारी सिवाय तेरे न मैंने चाहा
तुम्हारे कदमो में जिंदगी है मुझे मिटा तो या तुम सजा लो

ये जो खुमारी चढ़ी हुई है इसी में सारे फ़िज़ा समाई
मेरी मुहब्बत जवां रहेगी कि दिल में अपने मुझे समा लो ।

रहे सलामत ये प्यार मेरा यही दुआ है हमारे दिल की
जहाँ भी जाओ बहार झूमें ये जिंदगी का सही मज़ा लो ।

गुमान मुदिता के तुम बने हो हरेक ज़र्रा गवाह देती
अँधेरे घर में शमा जली है गजल तुम्हारी मुझे बना लो । ---- *माधुरी डड़सेना " मुदिता "*

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