KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

गर हम कहते हैं

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गर हम कहते हैं


गर हम कहते हैं
कोई ऊंच-नीच नहीं है।
तो फिर हम
डरे क्यों किसी से ?
सबका सरकार एक है ।
सबका अधिकार एक है ।
सबका रिश्ता इंसानियत का
सबका आधार एक है ।
गर हम कहते हैं
भारत माँ के सब बेटे हैं
तो फिर
उलझे क्यूँ किसी से ?
सबका भगवान एक है ।
सबकी मुस्कान एक है ।
सबकी भावना एक सी
सबकी जुबान एक है ।
गर हम कहते हैं
इस देश के रखवाले हैं ।
तो फिर
बँटे क्यों एक दूसरे से ?
संघ समाज एक है
रीति रिवाज एक है ।
एक है रंग रुप भाषा
वेशभूषा साज एक है ।
गर हम कहते हैं
कि हम स्वतंत्र हैं
तो फिर हम
दबकर रहे क्यों किसी से?
आओ भर लें उड़ान।
देखें हमें सारा जहान।
स्वयं को लें पहचान।
देश को करें महान।।

✒️ मनीभाई’नवरत्न’,छत्तीसगढ़

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