KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

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मैं एक गरीब ग्रामीण बुढ़ा किसान हूँ

किसानो की दर्दनाक दास्तान |

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मैं एक गरीब ग्रामीण बुढ़ा किसान हूँ

मैं एक गरीब ग्रामीण बुढ़ा किसान हूँ ,
कर्मठ साधारण निडर इंसान हूँ |

पहनता सफ़ेद कुरता धोती या पायजमा ,
रंग बिरंगी पगड़ी सर पर मेरी शान है |

जीवन के हर दौर में कुचला गया ,
सरकारों से संघर्ष करता बुढ़ा किसान हूँ |

मैं एक गरीब ग्रामीण बुढ़ा किसान हूँ.

मैं दो बैलो की जोड़ी का मालिक हूँ
लकड़ी का हल ही बसी मेरी जान है |
नंगे पाँव दिन रात बहाते खेत में पसीना ,
खाने का हो जाये अनाज उगाने के जुगाड़ में हूँ |

मैं एक गरीब ग्रामीण बुढ़ा किसान हूँ.

कभी खाद बीज पानी की किल्लत ,
कभी बिजली कभी कर्ज के नोटिस से हैरान हूँ
मेरे अपने हार के कर चुके आत्महत्या ,
किसानी छोड़ मजदुरी करने को परेशान हूँ |

मैं एक गरीब ग्रामीण बुढ़ा किसान हूँ.

कब सरकारी लोग जमी हड़प ले ,
अपने खेत बचाने की लिए सर फोड़ रहा हूँ
सड़कों पर सो रहे किसान के बच्चे ,
कितना भी चिल्लाओ सरकार के सर पर जूं रेंगती नहीं |

मैं एक गरीब ग्रामीण बुढ़ा किसान हूँ.

बढती महंगाई में बच्चों को कैसे पाले ,
पढ़लिख कर भी क्या होगा नौकरी हैं नहीं ,
बूढ़ी हड्डियों में अब वो दम कहा ,
अपनी जमीने बेचकर जिन्दा रहने को मजबूर हूँ |
मैं एक गरीब ग्रामीण बुढ़ा किसान हूँ.

द्वारा : कमल कुमार आजाद
बिलासपुर, छत्तीसगढ़

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