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बीते समय पर कविता

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बीते समय पर कविता

घड़ी बदलाव

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हम रहो के राही है
भटक जाए इतना आसान नहीं
इतना रहो में गुमार नही
हम से टकरा जाए इतना हकूमत में साहस नही
हो जाता है
चिर हरण जैसे जब अपने घर ही ताक नही
अपने बच्चे ही हाथ नही
दुनिया में खूब कमाई दौलत
पर करता रहा में कोई राम राम नही
चलना आता है
पर करता है जमाना काट यहि
इतना किसी में दम नही
हमारे सामने कोई टिका नही
चिंता के इस दौर में
आज भी हम
किसी के गुलाम नही
आईडिया हमारे दर के सही
या यू कह दे हमारे गुलाम यहि
लेकिन जमाने में अभी हमारा निशान नही
होगा जल्द कोशिस हमारी
करेगी कोई काम सही

-सुरेंद्र कल्याण बुटाना
Surender Kalyan Butana

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