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गुलाब की अभिलाषा – अकिल खान

गुलाब की अभिलाषा का वर्णन कविता के माध्यम से किया गया है।

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गुलाब की अभिलाषा – अकिल खान

मैं गुलाब हूंँ फेंकना न मुझे यहांँ वहांँ,
मेरी खुशबू से सुगंधित है सारा जहांँ।
देख कर मुझे खुश होता है उदास मन,
मेरी काया से सुशोभित है धरा – गगन।
दुःखी मन हो प्रसन्न और दूर करूँ हताशा,
सम्मान की प्रत्याशा,गुलाब की अभिलाषा।

मेरी बाहों में कांँटे हैं जैसे जीवन में संघर्ष,
मधुकर के गुणगान से मन होता अति हर्ष।
मेरा सौभाग्य ,लोग करते हैं मुझसे नित्य पूजा,
लोगों के मन मै ही भाऊँ और कोई न रहे दूजा।
खिलूँ में हर समय दिन-रात हो या चौमासा,
सम्मान की प्रत्याशा,गुलाब की अभिलाषा।

जन्मदिन हो या विवाह करें सभी उपयोग,
मेरे साए में प्रेम का इज़हार करते हैं लोग।
कहता है गुलाब मेरी ख्वाहिश को पुरा कर देना,
कब्र में और राहें वीरों को गुलाब से भर देना।
हे मानव इस संसार मे मेरी छोटी सी आशा,
सम्मान की प्रत्याशा,गुलाब की अभिलाषा।

गुलाब तेरी खुशबू से महक उठता मेरा तन-मन,
कोई घुमे यत्र-तत्र किसी को याद आए वृंदावन।
कोई रखे पुस्तक में कोई करे बालों में श्रृंगार,
गुलाब कहे मैं प्रेम हूंँ और प्रेम ही मेरी पुकार।
मुझे देकर उपहार लोग करें प्रेम-प्रत्याशा,
सम्मान की प्रत्याशा,गुलाब की अभिलाषा।

दुखियों को मनाऊंँ और मैं रोते हुए को हंसाऊँ,
विरह काल में प्रेमी के लिए प्रेम की गीत गाऊंँ।
मैं खुदगर्ज नहीं कैसे अपनों को भूल जाऊंँ,
उदास गमगीन चेहरे पर मै मुस्कान ले आऊंँ।
देखकर मुझे भाग जाती है प्रबल निराशा,
सम्मान की प्रत्याशा,गुलाब की अभिलाषा।

मुझे बेचकर असहाय लोग करते हैं गुजारा,
मेरी सजावट से समारोह में होती उजियारा।
कर उपयोग देते हो यत्र-तत्र मुझे फेंक,
मेरा हृदय दुःखता है यह अपमान देख।
जिंदगी संवार दो यही है गुलाब की पिपासा
सम्मान की प्रत्याशा ,गुलाब की अभिलाषा।

अकिल खान रायगढ़ जिला – रायगढ़ (छ.ग.) पिन – 496440.

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