गुरु अपना बस ऐसा हो

गुरु अपना बस ऐसा हो ,मिला सहज धन जैसा हो ।
अमृत ज्ञान को बरसा कर ,जीवन रस भर देता हो।।

घड़ कच्ची मिट्टी देता हो , आकार सुंदर कर देता हो।
निखार कर पूर्ण व्यक्तित्व , मन विकार हर देता हो।।

दृष्टि ममतामयी रखता , सृष्टि अलग ही रचता हो।
वृष्टि प्यार की कर देता , खुशी के रंग भर देता हो ।।

पारंगत हर कला में हों , वो निपुण हर सलाह में हो।
एकाग्र कर सब शिष्यों को , ध्यान लक्ष्य पर देता हो।।

विचक्षण बुद्धि रखता हो , विलक्षण ज्ञान भरता हो ।
दुष्कर राहें समझा कर , मंजिल दिखा भर देता हो।।

कहे बिन बात समझता हो , दिल में शिष्य के बसता हो।
अनकही पहेली बूझ कर , बता जीवन गुर देता हो।।

गुरू में ईश्वर दिखता हो , समस्या सभी हर देता हो।
हमको हमसे मिलवाकर , ज्ञान प्रखर कर देता हो ।।

मधुसिंघी

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