KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

हाँ मैं नारी हूँ

कविता बहार-कविता लेखन प्रतियोगिता
कविता लेखन प्रतियोगिता-2021
प्रतियोगिता अवसर-8 मार्च, अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस
प्रतियोगिता विशेषांक-महिला जागृति‘‘हाँ मैं नारी हूँ, मैं चेहरे की हवाईयाँ ही नहीं, आज मैं हवाई जहाज भी उड़ाती हूँ’’

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हाँ मैं नारी हूँ

मैं ही तुमको जीवन देती हूँ लेकिन अपना नाम नहीं देती हूँ।
लेकिन तुम यह नहीं जानते हो कि मैं ही इस संसार की रचना करती हूँ।।


‘‘हाँ मैं नारी हूँ, मैं चेहरे की हवाईयाँ ही नहीं, आज मैं हवाई जहाज भी उड़ाती हूँ’’
तुम इस संसार में मुझे बस सुनाते हैं, फिर भी मैं कुछ नहीं कहती हँू।
लेकिन तुम यह नहंी जानते हो कि मैं सब कुछ समझती हूँ।।
‘‘हाँ मैं नारी हूँ, मैं चेहरे की हवाईयाँ ही नहीं, आज मैं हवाई जहाज भी उड़ाती हूँ’’


तुम मुझे बुरा भला कहते हो तो भी मैं तुम्हारे सामने जवाब नहीं देती हूँ।
लेकिन तुम यह नहीं जानते हो कि मैंने अपने पति के जीवन को यमराज से भी छुडा़या है।।
‘‘हाँ मैं नारी हूँ, मैं चेहरे की हवाईयाँ ही नहीं, आज मैं हवाई जहाज भी उड़ाती हूँ’’
तुम मुझे रोज ताने मारते हो तो भी मैं तुम्हारे साथ ही रहती हँू।
लेकिन तुम यह नहीं जानते हो कि मैंने एक बार अपने प्रेम की खातिर जहर को भी पी लिया है।।


‘‘हाँ मैं नारी हूँ, मैं चेहरे की हवाईयाँ ही नहीं, आज मैं हवाई जहाज भी उड़ाती हूँ’’
तुम मुझे कमजोर समझते हो लेकिन मुझे मेरे ईश्वर ने सहनशक्ति दी है।
लेकिन तुम यह नहीं जानते हो कि मैंने एक बार अपने राज्य की खातिर

अपने बच्चे को पीठ पर बाँधकर अग्रेजोें को धूल चटायी है।।
‘‘हाँ मैं नारी हूँ, मैं चेहरे की हवाईयाँ ही नहीं, आज मैं हवाई जहाज भी उड़ाती हूँ’’
तुम मुझे रोजाना अपने पिंजरे में कैद करने की कहते हो।
लेकिन तुम यह नहीं जानते हो कि मैं चाँद पर भी होकर आयी हूँ।।


‘‘हाँ मैं नारी हूँ, मैं चेहरे की हवाईयाँ ही नहीं, आज मैं हवाई जहाज भी उड़ाती हूँ’’
तुम मुझे नारी समझते हो लेकिन मैं नारी नहीं नारायणी हूँ।
लेकिन तुम यह नहीं जानते हो कि मैं ही तेरी रचयिता हँू।।


‘‘हाँ मैं नारी हूँ, मैं चेहरे की हवाईयाँ ही नहीं, आज मैं हवाई जहाज भी उड़ाती हूँ’’
तुम मुझे कार्य करने की मशीन समझते हो फिर भी मैं तेरे सुख दुख में साथ देती हँू।
लेकिन तुम यह नहीं जानते हो कि इस दुनिया को मैं ही चलाती हँू।।


‘‘हाँ मैं नारी हूँ, मैं चेहरे की हवाईयाँ ही नहीं, आज मैं हवाई जहाज भी उड़ाती हूँ’’
तुम मेरे चरित्र पर सवाल उठाते रहे मैं केवल परीक्षा देती रही।
लेकिन तुम यह नहीं जानते हो कि मैंने अपने पति के वचन की खातिर चैदह वर्ष वनवास किया है।।
‘‘हाँ मैं नारी हूँ, मैं चेहरे की हवाईयाँ ही नहीं, आज मैं हवाई जहाज भी उड़ाती हूँ’’


तुम मेरी हर समय तपस्या लेते रहे तो भी मैं देती रही।
लेकिन तुम यह नहीं जानते हो कि जरूरत पड़ने पर मैं पत्थर की अहिल्या भी बन गयी।।
‘‘हाँ मैं नारी हूँ, मैं चेहरे की हवाईयाँ ही नहीं, आज मैं हवाई जहाज भी उड़ाती हूँ’’


धर्मेन्द्र वर्मा (लेखक एवं कवि)
जिला-आगरा, राज्य-उत्तर प्रदेश
मोबाइल नम्बर-9457386364,
9557356773

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