KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

हल्दीघाटी समर- बाबूलाल शर्मा {आल्हा/वीर छंद}

आल्हा/वीर छंद- (16,15,पर यति कुल 31.मात्रिक छंद,दो पंक्तियों मे, तुकांत गुरु लघु)

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हल्दीघाटी समर- बाबूलाल शर्मा


हल्दीघाटी समरांगण में,
          सेना दोउ खड़ी तैयार।
मुगलों का भारी लश्कर था,
       अरु राणा,रजपूत सवार।

भारी सेना थी अकबर की,
.        सेनापति मुगलिया मान।
भीलों की टुकड़ी राणा की,
.      अरु केशरिया वीर जवान।

आसफ खाँ बदाँयुनी जैसे,
.     लड़ते समर मुगलिया शान।
शक्ति सिंह भी बागी होकर,
.       थाम चुका था वही कमान।

राणा अपनी आन बान की,
.        रखना चाहे ऊँची शान।
मुगलों की सेना से उसने,
.      कीन्हा युद्ध बड़ा घमशान।

मुगल सैन्य विचलित जब होती,
.         धीरज दे कछवाहा मान।
हाथी के हौदे पर बैठा,
        बीच समर जैसे शैतान।

राणा कीका लड़े समर में,
.        होकर चेतक पीठ सवार।
भारी भरकम कर ले भाला,
.       एक हाथ मे ले तलवार।

पूँजा भील रणमत्त फिरै यो
.      बरछे तीर संग तलवार।
अजब शौर्य था भीलों का,
.     कटने लगे मुगल सरदार।

सूरी हाकिम खान दागता,
.         तोपन गोले बारम्बार।
तोप सामने जो भी आते,
.        मुगलो की होती बरछार।

जोश भरा जाता वीरों में,
.     सुन सुन राणा की ललकार।
चेतक की टापों से होते,
.        घोड़े मुगल हीन बदकार।

भारी मार मची समरांगण,
.          जूझे योद्धा वीर तमाम।
मुगलों ने तब युक्ति निकाली,
.       बचे मुगल योद्धा इस्लाम।

दोउ पक्ष रजपूते मरते,
.     देख चकित मुगलिया चाल।
रक्त उबल आया राणा का,
.       आँखे हुई क्रोध से लाल।

किया इशारा तब चेतक को,
.      चेतक ने भर लई उछाल।
दोउ टाप मान गज मस्तक,
.      राणा ने फेंका तब भाल।

गज हौदे मे छुपा मान यों,
.        खाली गया वीर का वार।
हस्तिदंत असि लगकर घायल,
.       हुआ अश्व चेतक लाचार।

राणा घायल थकित समर में,
.         संग हुआ चेतक बेहाल।
झाला मान ने छत्र सँभाला,
.        बचे वीर मेवाड़ी भाल।

मुगलों की भारी सेना अरु,
.       मक्कारी की चलते चाल।
हल्दीघाटी रक्तिम हो गई,
.         रजपूती सेना बेहाल।

दशा देख राणा चेतक की,
.         करे पलायन ईश सहाय।
नाला आया फाँदाँ चेतक,
.        वीर बचाये प्राण गवाँय।

पीछा करते आए सैनिक,
.     शक्ति सिंह की पड़ी निगाह।
मार गिराये उनको शक्ति,
.       राणा हुए तभी आगाह।

शक्तिसिंह भ्राता से मिलते,
.        राणा मिले भुजा फैलाय।
चारो आँखें झर झर बहती,
.      आँसू जल चेतक नहलाय।

शक्ति बंधु प्रताप पाया था,
.       राणा पाय शक्ति बलवान।
दो दो पूत मातृभूमि के,
.        मेवाड़ी धरती धनवान।

युद्ध विजेता भले मुगल हो,
.       धर्म विजेता शक्ति प्रताप।
ऐसे वीर हुए जिस भू पर,
.       हरते मातृभूमि संताप।

वीर छंद यह पहला अवसर,
.        लिखता शर्मा बाबू लाल।
नमन करूँ हल्दीघाटी को,
.        उन्नत सिर मेवाड़ी भाल।

बाबू लाल शर्मा “बौहरा”
सिकंदरा, दौसा,राजस्थान

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