KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

मुक्त छंद रचना-हमसफर (बाबूलाल शर्मा )

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हमसफर (बाबूलाल शर्मा )

क्यों आया है?

कौन लाया तुम्हे?
पैदा किया किसने?
आया तो कैसे?
कैसा रहा?
हवाई सफर !!

मेरे देश में
हुआ था स्वागत भी
जाने,अनजाने में
नेताओ ने किया
अधिकारियों ने भी
हो बेखबर!!
मगर मजदूरो से
खाली क्यों हुआ
हर महानगर
हमारा शहर!!

खा चुके तुम
बहुत अब तक
अफसर नेता
पूँजीपति ठेकेदार
अभिनेता, कार्मिक
और … और
गरीबों का निवाला
अरे बेसबर!!

किए रोशन मरघट
चहल पहल कब्रों पर
नदियों के घाटों पर
सिसकती मातम की भीड़
केशों की कतर कतर!!

जाओ तो विदाई दें
ह्वेनसांग की तरह
हँसकर या रो कर
रहो तो समा जाओ
दलाईलामा बन
हममें हमारे जैसे
दूध में शक्कर से
नींबू मत बन
आता है निचोड़ना भी,
अच्छा है बन जा
हम सफर!!

निभालेंगें तुझे
कोरोना हम,
उन्मूलन भी बहुत
किए हमने तो,
मत बने कहर
मत बने कहर…!!

✍©
बाबू लाल शर्मा,बौहरा,विज्ञ
सिकंदरा, दौसा, राजस्थान

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