KAVITA BAHAR
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हां मैं तो मजदूर हूं

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हां मैं तो मजदूर हूं

हां मैं तो मजदूर हूं, मेहनत के नशे में चूर हूं ,
कहने वाले कुछ भी कहे मैं समझूं खुद को नूर हूं ,

थकना कभी न जानू में आगे ही बढ़ता रहता हूं ,
गर्मी हो या दिन जाडे़ का सब कुछ सहता रहता हूं ,
मैं जो रूका तो सुन लो ये धरती भी थम जाएंगी ,
पूल कभी तो बड़ी इमारत हर दम गढ़ते रहता हूं ,
करूं सदा कर्तव्य का पालन समझो ना मजबूर हूं ,
मैं हां ……………..
चीर के पाषाणो को जल की धारा बहा मैं सकता हूं,
पतझड़ के मौसम में भी फूल खिला मैं सकता हूं,
नामुमकिन का शब्द नहीं मेरे शब्दों के भंडार में ,
उजड़ी बस्ती को यारों फिर से बसा मैं सकता हूं ,
अपनी बाजू पर है भरोसा समझो ना मगरूर हूं ।
हां मैं तो ……………….
छोटी सी दुनिया है मेरी जीवन सीधा साधा है ,
नहीं किसी से शिकवा मुझ को रोटी मिले जो आधा है,
नहीं चाहिए हीरे मोती रब ने दिया जो प्यारा है ,
राम ह्रदय में बसते हैं मुख में कान्हा राधा है ,
खाता हूं मेहनत की रोटी घोटालों से दूर हूं ।
हां मैं तो……………..
       जागृति मिश्रा रानी
कविता बहार से जुड़ने के लिये धन्यवाद

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