KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

हरिपदी छंद में गणेश  वंदन

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हरिपदी छंद

विधान- २६ मात्रा प्रति चरण
चार चरण दो-दो समतुकांत हो
१६, २६ वीं मात्रा पर यति
चरणांत– गुरु गुरु २२

               __गणेश  वंदन__

प्रथम नमन हे गणपति देवा, तुम सबसे प्यारे।
सकल सँवारो  काज गजानन, हे  देव  हमारे।
शिव प्रियप्रथम पूज्य हे प्रभुजी,गौरी के जाए।
एकदन्त करुणा के सागर, गणपति कहलाए।
मोदक मिसरी, पान पताशा, से भोग लगाऊँ।
विघ्न हरण हो सबसे  पहले, मैं तुम्हें मनाऊँ।
तन के कष्ट सभी  प्रभु हरना, मेरी  मन पीरा।
सृजन करूँ नित मैं छंदों का,बिनहुए अधीरा।
मेरा सृजन बने सुन्दरतम, सब के हितकारी।
दूर करो संशय  सब मेरे, प्रभु  भाव विकारी।
पूजूँ प्रथम आपको  प्रभुवर, मैं तुम्हें मनाऊँ।
वंदन हित हिय  करूँ समर्पित, चौपाई गाऊँ।
विघ्न नही हो हे प्रभु लेखन, चरणों में आया।
चाहूँ नित सत्यार्थ सुलेखन, यही भाव लाया।
शिव सुत वंदन गौरी नंदन, हे  जग  के  देवा।
गणपति करहुँ तुम्हारा वंदन,चरणों की सेवा।
रिद्धि  सिद्धि  के  संग  पधारो, हे मेरे  दाता।
हे  प्रभु  मेरे लेख सुधारो, शरणागति आता।
गणनायक हे  देव  गणेशा, हे भव भयहारी।
सेवा  तेरी  करूँ  हमेशा, मानस   शुभकारी।
.                  ———–+——–
©~~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
बाबू लाल शर्मा, बौहरा, विज्ञ
सिकंदरा, दौसा, राजस्थान
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