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हाय रे! मेरे गाँवों का देश -मनीभाई नवरत्न

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हाय रे! मेरे गाँवों का देश -मनीभाई नवरत्न

हाय रे ! मेरे गांवों का देश ।
बदल गया तेरा वेश।

सूख गई कुओं की मीठी जल ।
प्यासी हो गई हमारी भूतल ।
थम गई पनिहारों की हलचल ।
क्या यही थी विकास की पहल ?
क्या यही है अपना प्रोग्रेस ?
हाय रे! मेरे गांवों का देश ।

भूमि बनती जा रही बंजर ।
डीडीटी यूरिया का है असर ।
कृषि यंत्र बना रहे बेकार के अवसर ।
क्या यही है विकास का सफर?
हम हार चुके अपना रेस ।
हाय रे !मेरे गांवों का देश ।

सुबह ने मुर्गे की बांग भूली।
और शाम नहीं अब गोधूलि ।
पेड़ भी कट रहे जैसे गाजर-मूली ।
गांव का विकास बनी सचमुच पहेली ।
क्या यही है भावी पीढ़ी का संदेश।
हाय रे !मेरे गांवों का देश।

manibhainavratna
manibhai navratna

-मनीभाई नवरत्न

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