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हिन्दी वंदना -डी कुमार अजस्त्र

हिन्दी दिवस पर विशेष स्वरचित हिन्दी वंदना….

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(हिंदी दिवस पर विशेष -हिंदी-वन्दना)

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नए बोल सिखाती है ,
मुझे ज्ञान कराती है ।
ए माँ भाषा तू ही मुझको,
सम्मान दिलाती है ।
नए बोल सिखाती है ……..

भारत का है गौरव तू ,
चमकी बन भानु प्रभा ।
जन-जन में है सौरव तू ,
महकी हर दिशा दिशा ।
भारत-सुत में तू ही ,
नया स्वाभिमान जगाती है ।
नए बोल सिखाती है ,
मुझे ज्ञान कराती है ।
ए माँ भाषा तू ही मुझको ,
सम्मान दिलाती है ।
नए बोल सिखाती है ……..

अ से अज्ञानी जन को ,
तू ज्ञ से ज्ञान कराए ।
भ से भारत का जग में ,
तू ध से ध्वज फहराए ।
वर्णमाला ये तेरी ,
नव-नव गीत बनाती है ।
नए बोल सिखाती है ,
मुझे ज्ञान कराती है ।
ए माँ भाषा तू ही मुझको ,
सम्मान दिलाती है ।
नए बोल सिखाती है ……..

संस्कृति में तूने लिया जन्म,
जन-जन ने तुझे अपनाया ।
मैथिली बने संरक्षक तेरे ,
भारतेंदु ने जीना सिखाया ।
देवी ,सुभद्रा,प्रेम ,निराला ,
तू कब से बनाती है ।
नए बोल सिखाती है ,
मुझे ज्ञान कराती है ।
ए माँ भाषा तू ही मुझको ,
सम्मान दिलाती है ।
नए बोल सिखाती है ……..

(महादेवी वर्मा ,सुभद्रा कु.चौहान ,प्रेमचन्द ,सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला )

‘खड़ी बोली’ तू बन कर पनपी ,
अब व्यापकता ही पाए ।
तेरे इस इतिहास को शुक्ल,
सब जन-जन तक पहुँचाए ।
सरलता ही तेरी हमें,
अति सफल बनाती है ।
नए बोल सिखाती है ,
मुझे ज्ञान कराती है ।
ए माँ भाषा तू ही मुझको ,
सम्मान दिलाती है ।
नए बोल सिखाती है ……..

सखी नागरी संग में लेकर,
लिपि तूने अपनी बनाई ।
ध्वनि-रूप प्रमाणित करके,
वैज्ञानिकता सिद्ध कराई ।
जो जैसा बोला ,वैसा ही,
तू लिखना सिखाती है ।
नए बोल सिखाती है ,
मुझे ज्ञान कराती है ।
ए माँ भाषा तू ही मुझको ,
सम्मान दिलाती है ।
नए बोल सिखाती है ……..

अंग्रेजी भाषी मन को भी,
अब भाने लगी है तू भी।
भारत-सीमा भी पार कर,
जग समाने लगी है तू भी ।
गुरु टैगोर का बन आशीष तू ,
नई श्रद्धा जगाती है ।
नए बोल सिखाती है ,
मुझे ज्ञान कराती है ।
ए माँ भाषा तू ही मुझको ,
सम्मान दिलाती है ।
नए बोल सिखाती है ……..

लिखूँ ,बोलूं तुझको ही गाऊँ ,
सीखूं तुझसे ही,
मैं जीना सिखाऊँ ।
भले कुछ भी मैं पढूं ,पढ़ाऊँ,
तेरा ही बस वन्दन चाहूँ।
तू ही तो *डी कुमार* को,
अब *अजस्र* बनाती है ।
नए बोल सिखाती है ,
मुझे ज्ञान कराती है ।
ए माँ भाषा तू ही मुझको,
सम्मान दिलाती है ।
नए बोल सिखाती है ……..

✍✍ *डी कुमार–अजस्र(दुर्गेश मेघवाल)*

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