KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

हमर गंवई गाँव

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हमर गंवई गाँव

1 आबे आबे ग सहरिया बाबू
हमर गंवई गाँव
गड़े नही अब कांटा खोभा
तुंहर कुँवर पांव
आबे आबे सहरिया बाबू
हमर गंवई गाँव।।

2 गली गली के चिखला माटी
वहु ह अब नंदागे।
पक्की सड़क पक्का नाली
हमरो गांव म छागे।
लइका मन बर स्कूल खुलगे
जगाथे गाँव के नाव।
आबे आबे ग सहरिया बाबू
हमर गंवई गांव ।।

3 नरवा खड़ म मील बनाहे
बज -बजाथे खड़ ह।
गोला गोला  पेड़ कटवाहे
दिखे नहीं कोयली ह।
कुँआ बउली कोन पूछे अब
बोर खनागे गाँव।
आबे आबे ग सहरिया बाबू
हमर गंवई गाँव।।

4 पहिली के जंगल ह छटागे
बघुवा भालू ह भगागे
गाय गरु के चारा ह सिराथे
गउ ठान ह सकलागे
नई मिले अब छपरी छानी
नईहे खदर के छाँव ।।
आबे आबे ग सहरिया बाबू
हमर गंवई गाँव।।

5 मिलजुल के हमर गाँव मनाथे
जम्मों तीज तिहार।
भेदभाव ह घुरूवा म पटागे
आथे सबके  काम।
खेलत कमावत दिन ह पहाथे
रतिया मया के छाँव।।
आबे आबे ग सहरिया बाबू ते
हमर गंवई गॉव।।

माधुरी डड़सेना
नगर पंचायत भखारा
छ .ग.

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