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होड़ लगी है विश्व में करें इकट्ठा शस्त्र

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होड़ लगी है विश्व में करें इकट्ठा शस्त्र

होड़ लगी है विश्व में, करें इकट्ठा शस्त्र।
राजनीतिक होने लगी,खुले आम निर्वस्त्र।।

सीमाएँ जब लाँघता,है सत्ता का लोभ।
जन-मन को आक्रांत कर,पैदा करता क्षोभ।।

सत्ताधारी विश्व के, पैदा करें विवाद ।
शांति हेतु अनिवार्य है,जनता से संवाद।।

सृजनात्मक सहयोग से,बंद करें कटु युद्ध ।
धरती पुत्रों अब उठो,सम्हलो स्वार्थ विरुद्ध।।

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देश-धर्म के नाम पर,सत्ता खेलें खेल।
आम नागरिक के लिए,घर बन जाता जेल।।

शक्ति, सृजन में जब लगे,करे प्रेम सहगान।
युद्ध नहीं तब बुद्ध की,फैलेगी मुस्कान ।।

ग्वाला जब वंशी लिए,छेड़ेगा अनुराग।
जागेगा तब ही धरा,के भविष्य का  भाग।।

गौरैया से लाडली,की होगी जब बात।
उस दिन होगा देखना, कितना मधुर प्रभात।।

जब बैलों की पीठ पर,हलधर फेरे हाथ।
पढ़ लेना उस दृश्य को,धरती नहीं अनाथ।।

—- रेखराम साहू —-

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