मुक्तक कैसे लिखें [MUKTAK]

मुक्तक कैसे लिखें [MUKTAK]

  • मुक्तक में सामान्यतःचार पंक्तियाँ होती है।
  • चारों पंक्तियों में मात्रा भार समान होता है।
  • मुक्तक (चतुष्पदी) में लय और सुविधानुसार मात्रा   निर्धारित की जा सकती है।
  • यथा 28 मात्रिक, 24 मात्रिक
  • मैने 8 मात्रिक भी लिखा है।
  • प्रथम द्वितीय व चतुर्थ पंक्तियाँ समतुकांत हो। जबकि तीसरी पंक्ति में तुकांत न मिले।
  • यह चार पंक्तियों की ऐसी  कविता (रचना) है। जो नियमबद्ध व लयबद्ध  तरीके से किसी घटना या भाव को स्वतंत्र व सम्पूर्ण  रूप से प्रकट करनें में सक्षम हो।
  • बहुत से मुक्तक एक साथ  लिखे जा सकते है। परन्तु प्रत्येक मुक्तक एक दूसरे से मुक्त है। शायद इसीलिए मुक्तक है।

मुक्तक के उदाहरण

उदाहरण:—

   *मुक्तक ( 16 मात्रिक )*
 
जाग मुसाफिर यह साल चली,
नव साल  मनेगी  गली  गली।
जागृत  हो कर चेतन हो जा,
नव रीत निभानी भली भली।
 
कितने  कितने नाम गिनाऊँ,
उनके किस्से  काम बताऊँ।
समय मुसाफिर सबसे आगे,
समय सिकंदर शीश नवाऊँ।
 
बाबू लाल शर्मा “बौहरा”
 

क्या है मुक्तक ?

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  • लोग मुक्तक का अर्थ हर तरह से मुक्त होकर लिखी रचना से लगाते हैं ,जो गलत है । मक्तक का अर्थ हर तरह के नियमों में बँधी वह रचना है, जिसकी पंक्तियों का पूरा -पूरा भाव निकलता हो । जैसे गजल के शेर (गजल में हर शेर स्वतंत्र होता है जिसका आगे पीछे के शेर से कोई अर्थगत संपर्क नहीं होता ) मुक्तक कहलाता है ,पर शेर का नियम तो होगा । उसकी बहर होगी ,काफिया रदीफ होगा ,सब होगा ।उसी तरह दोहा भी मुक्तक की श्रेणी में आता है ,जिसका रचना विधान है (बिहारी को मुक्तक का बादशाह कहा जाता है) ।
  • मुक्तक मतलब ,वह रचना जो भाव तो स्वतंत्र रखती हो ,पर काव्य रचना के नियमों में बँधी हो । नियमों से मुक्त छंद को मुक्तक कहने की गलती न करें । वह एकदम अलग बात है। मुक्तक कोई कविता का पार्म नहीं है , बल्कि छोटी -नियमबद्ध कविता है , जिसका विषय और भाव मुक्त-स्वतंत्र होता है ।
  • चतुष्पदी में 4 पंक्ति जरूरी है,मुक्तक में 2 से 10-12-14-पंक्तियाँ भी हो सकती हैं । चतुष्पदी भी मुक्तक ही है । ग़ज़ल भी तो संपूर्णता में मुक्तक ही है। ये कहें कि ग़ज़ल भी मुक्तक का गुच्छा है। मुक्तक कोई कविता विधा का नाम नहीं है, जैसे दोहा,चौपाई,गजल,रुबाई, कत्आ,आदि।
  • मुक्तक वह हर छोटी रचना कहला सकती है ,जो छंद नियमों का पालन करते हुए स्वतंत्र/मुक्त भाव रखती है। दूसरे ,जैसे मान लीजिए ,आप राजनीति पर,प्रेम पर,गरीबी पर,समाज की दशा पर छोटे छंदों में कुछ लिखा तो वह मुक्तक है ,पर अगर चौपाई ,दोहे में लंबी कथा कहेंगे ,तो वह मुक्तक नहीं होगा ।
  • उर्दू में एक मसनवी होता है ,उसमें शेर बी होते हैं पर,वे किसी मुसलसल कहानी का हिस्सा होते हैं . मसनवी भी मुक्तक में नहीं कही जाएगी । तुलसी दास ने दोहों-चौपाई में रामकथा कही है ,तो वह भी मुक्तक नहीं है ।
    ———–प्रो.शंभूनाथ तिवारी जी, एसोसिएट प्रोफेसर अलीगढ़ मुस्लिम
 

आधुनिक युग में हिन्दी के आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने मुक्तक पर विचार किया. उनके अनुसार:

मुक्तक में प्रबंध के समान रस की धारा नहीं रहती, जिसमें कथा-प्रसंग की परिस्थिति में अपने को भूला हुआ पाठक मग्न हो जाता है और हृदय में एक स्थायी प्रभाव ग्रहण करता है. इसमें तो रस के ऐसे छींटे पड़ते हैं, जिनमें हृदय-कलिका थोड़ी देर के लिए खिल उठती है. यदि प्रबंध एक विस्तृत वनस्थली है, तो मुक्तक एक चुना हुआ गुलदस्ता है. इसी से यह समाजों के लिए अधिक उपयुक्त होता है. इसमें उत्तरोत्तर दृश्यों द्वारा संगठित पूर्ण जीवन या उसके किसी पूर्ण अंग का प्रदर्शन नहीं होता, बल्कि एक रमणीय खण्ड-दृश्य इस प्रकार सहसा सामने ला दिया जाता है कि पाठक या श्रोता कुछ क्षणों के लिए मंत्रमुग्ध सा हो जाता है. इसके लिए कवि को मनोरम वस्तुओं और व्यापारों का एक छोटा स्तवक कल्पित करके उन्हें अत्यंत संक्षिप्त और सशक्त भाषा में प्रदर्शित करना पड़ता है.

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

मुक्तक काव्य या कविता का वह प्रकार है जिसमें प्रबन्धकीयता न हो। इसमें एक छन्द में कथित बात का दूसरे छन्द में कही गयी बात से कोई सम्बन्ध या तारतम्य होना आवश्यक नहीं है। कबीर एवं रहीम के दोहे; मीराबाई के पद्य आदि सब मुक्तक रचनाएं हैं। हिन्दी के रीतिकाल में अधिकांश मुक्तक काव्यों की रचना हुई।

मुक्तक काव्य की वह विधा है जिसमें कथा का पूर्वापर संबंध न होते हुए भी त्वरित गति से साधारणीकरण करने की क्षमता होती है.

मेरी दृष्टि में आचार्य रामचंद्र शुक्ल की परिभाषा पर्याप्त है. अंतत: उसे चुना हुआ गुलदस्ता की कहा जा सकता है.

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This Post Has One Comment

  1. अनाम

    बहुत सुंदर रचना भैया जी।