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हर एक दिन को नए वर्ष की – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

इस कविता में जीवन के हर एक क्षण को नव वर्ष की तरह उत्सव के रूप में मनाने पर जोर दिया गया है |
हर एक दिन को नए वर्ष की – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

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हर एक दिन को नए वर्ष की – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

हर एक दिन को नए वर्ष की
मंगल कामना से पुष्पित करो
कुछ संकल्प लो तुम
कुछ आदर्श स्थापित करो तुम

हर दिन यूं ही कल में
परिवर्तित हो जाएगा
तूने जो कुछ न पाया तो
सब व्यर्थ हो जाएगा

उद्योग हम नित नए करें
हम नित नए पुष्प विकसित करें
कर्म धरा को अपना लो तुम
हर-क्षण, हर-पल को पा लो तुम

व्यर्थ समय जो हो जाएगा
हाथ ना तेरे कुछ आएगा
मात-पिता के आशीष तले
जीवन को अनुशासित कर

पुण्य संस्कार अपनाकर
अपना कुछ उद्धार करो तुम
इस पुण्य धरा के पावन पुतले
राष्ट्र प्रेम संस्कार धरो तुम

मानवता की सीढ़ी चढ़कर
संस्कृति का चोला लेकर
पुण्य लेखनी बन धरती पर
नित नए आविष्कार करो तुम

खिल जाये जीवन धरती पर
मानव बन उपकार करो तुम
अपनाकर जीवन में उजाला
नित नए आदर्श गढो तुम

नित नए आयाम बनो तुम
दयापात्र बनकर ना जीना
अन्धकार को दूर करो तुम
सदाचरण, सद्व्यवहार करो तुम

हर एक दिन को नए वर्ष की
मंगल कामना से पुष्पित करो
कुछ संकल्प लो तुम
कुछ आदर्श स्थापित करो तुम

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