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हरिश्चन्द्र त्रिपाठी ‘हरीश ‘ की कवितायेँ

प्रस्तुत कविता 14 सितंबर हिंदी दिवस पर लिखी गई है जिसमें हिंदी की महत्व का वर्णन किया गया है।

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हरिश्चन्द्र त्रिपाठी ‘हरीश ‘ की कवितायेँ

भारत महान हो

पूजा हो मन्दिरों में,
मस्जिद में अजान हो|
सारे जहाँ से अच्छा,
भारत महान हो ||


फिर कोई तैमूर या
बाबर न आ सके,
कोई लुटेरा लूट कर
हमको न जा सके |
मजहब के नाम पर
फिर यह मुल्क न बंटे –
कोई न कौम प्यार की
मोहताज रह सके |
अरुणाभ छितिज से पुनः
नूतन बिहान हो ||
सारे जहाँ से अच्छा
भारत महान हो ||1।।


सांझ के सुअंक पर
हो भोर की किरण नवल,
नेह से सने – सने हों
चारु-दृग -चषक -कंवल |
झूम- झूम वात -चपल
उर्वी श्रृंगार करे –
धूप -छॉव लीन हो
नित सृजन – विमल |
उत्कर्ष के उद्धोष में
संयम निदान हो |
सारे जहाँ से अच्छा
भारत महान हो ||2!।


चांदनी पुलक भरे
प्राण में अमरता,
द्वार – द्वार बह चले
ले मलय मधुरता |
सूर्य के प्रताप से
शस्य श्यामला ये सृष्टि –
नित नये संधान हो।
हर हृदय प्रचुरता
चिर बसन्त के अधर
पर देश गान हो ||
सारे जहाँ से अच्छा
भारत महान हो ||3!


रचनाकार :-हरिश्चन्द्र त्रिपाठी ‘हरीश ‘

कोरोना सम्बन्धी दोहे

जीवन की यह त्रासदी,
नहीं सकेंगे भूल,
एक भाव दिखने लगा,
माटी,सोना,फूल ।1।

नहीं कोरोना थम रहा ,
असफल सभी प्रयास ,
राजनीति नेता करें,
जनता हुई उदास ।2।

राम-भरोसे चल रही,
जीवन की हर सॉस,
प्राण वायु बिन मर रहे,
पड़ी गले में फॉस 3।

अगर बहुत अनिवार्य तो,
घर से बाहर जाय ,
समझ-बूझ मुख-आवरण,
तुरतहिं लेय लगाय।4।

संक्रमण के दौर में,
बचें बचायें आप,
मास्क लगा दूरी बना,
ना माई ना बाप ।5।

कोरोना के नाश-हित ,
इतना है अनुरोध,
ए सी ,कूलर भूल कर,
नहीं चलायें लोग ।6।

जी भर काढ़ा पीजिये,
सुबह-शाम लें भाप,
कोरोना भग जाएगा,
देखो अपने आप ।7।

पोषण समुचित लीजिए,
चाहें, रहें निरोग ,
नहीं संक्रमण छू सके,
करें अगर नित योग ।8।


हरिश्चन्द्र त्रिपाठी’ ‘हरीश’,

संकल्पित जिज्ञासा हिन्दी है

मातृभूमि प्रिय भरत भूमि पर ,
मॉं की भाषा हिन्दी है।
नित नूतन परिवेश सजाती,
सबकी भाषा हिन्दी है।टेक।

यदि करें सभी सम्मान,
देश के संविधान का ,
पंथ प्रशस्त स्वयम् हो जाये,
हिन्दी के उत्थान का ।
कोटि-कोटि कंठों में मचलती,
मन की आशा हिन्दी है ।
नित नूतन परिवेश सजाती ,
सबकी भाषा हिन्दी है।1।

शासन और प्रशासन सुन लो ,
इतना अनुरोध हमारा है ,
चुल्लू भर पानी ले डूबो,
हिन्दी ने तुम्हें संवारा है ।
थोथे नारे , संकल्पों में,
बनी तमाशा हिन्दी है ।
नित नूतन परिवेश सजाती,
सबकी भाषा हिन्दी है।2।

हमने ही तो प्रगतिशील बन,
हिन्दी को ठुकराया है ,
फूट डाल कर राज कराती,
अंग्रेजी अपनाया है।
चीर-हरण की आशंका में,
उत्कट अभिलाषा हिन्दी है।
नित नूतन परिवेश सजाती ,
सबकी भाषा हिन्दी है।3।

आओ स्नेह लुटाये मिलकर,
हरें सभी की पीरा,
इसके हर अक्षर में ढूँढें,
तुलसी ,सूर,कबीरा ।
भारतेन्दु व महावीर की,
संकल्पित जिज्ञासा हिन्दी है।
नित नूतन परिवेश सजाती ,
सबकी भाषा हिन्दी है।4।

हरिश्चन्द्र त्रिपाठी ‘हरीश,
ई — 85
मलिकमऊ नई कालोनी,
रायबरेली 229010 (उप्र)
9415955693,9125908549

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