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जब लेखनी मुँह खोलती है

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जब लेखनी मुँह खोलती है

जिंदगी में कुछ अपनो के किस्से खास होते हैं
छलते हैं वे ही हमें जो दिल के पास होते हैं।
वंचना भी करते हैं
फिर भी खुशी की आस होते हैं
लहरों के नर्तन में नाविक का विश्वास होते हैं।


न जाने क्यों फिर भी हम उनके साथ होते हैं
वे ही हमारी सुबह शाम और रात होते हैं।
उनकी आँखों में उल्फत का न कोई नाम होता है
फिर भी उन्हीं के नाम हर साकी और जाम होता है।
उनके सितम आह भरकर झेल जाते हैं
न जाने लोग जज्ब़ातों से कैसे खेल जाते हैं।


संवेदना के नाम पर गैरत की चाल चलते हैं
बेगानों से वह प्यार का मसीहा बनकर मिलते हैं।
आंधी,तूफान,आपदा उनकी नफ़रत से भी हल्के लगते हैं
हमारे बिना महफ़िल में उनके खूब ठहाके लगते हैं।
बिना प्यार जीवन सूना किताबी बातें लगती हैं,
अपनों के बिना ही रस्म रिवाजों की शामें ढलती हैं।


तीज त्योहार सूने खुद ही मनाने पड़ते हैं
मुट्ठी में नमक लिए फिरते हैं लोग
ज़ख्म छुपाने पड़ते हैं।
लवों पर हँसी,रौनक जग को दिखानी पड़ती है
खुद अपना हमसफर बनकर रीत निभानी पड़ती है।

अपने गैर बन जाएं तो दुनिया वीरानी लगती है
उनके बदलने की आशा बड़ी नादानी लगती है।
रुख हवाओं का एक सा नहीं रहता
झूठी तसल्ली लगती है
पतझड़ मधुऋतु सी सुखद लगती
जब लेखनी मुँह खोलती है।

कुसुम

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