KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

जाडा-बाबूलाल शर्मा

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~~~~~~~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा
? *ढूँढाड़ी- –कुण्डलिया छंद* ?

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जाड़ो पड़ गो जोर को, थर थर  काँपै गात।
पाल़ो पड़तो फसल पै,होय जियाँ हिमपात।
होय जियाँ हिमपात, ओस रात्यूँ  या टपकै।
म्हारै  मरुधर  माँय, गाय  सूनी   ही  भटकै।
गाड़ोलिया  लुहार, शरण उनकै बस  गाड़ो।
सहै,  घाम  बरसात, बिगाड़ै   काँई   जाड़ो।
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जाड़ा तू है खोड़लो,दुशमन गुरबत ढोर।
माकड़ कीट पखेरवाँ, विरहा  बूढ़ै  चोर।
बिरहा  बूढ़ै चोर, शीत मैं  थर थर काँपै।
होय साँस को रोग,जियाँ ये विरहा हाँपै।
खाँसू  ल्यावै  ढोर, रजाई  बकरी,,पाड़ा।
किय्याँ करै मजूँर, पड़ै जद जोराँ जाड़ा।
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पाणत फसलाँ मै करै,धरती पूत किसान।
रात रात  रुल़ता फिरै, वै  भी  छै  इंसान।
वै  भी  छै  इंसान, आज  गुरबत के मारै।
भूख  नंग  महादेव , भरै   वै  पेट  हमारै।
शर्मा बाबू लाल, देय अब कुण नै लानत।
मंत्री,नेता दोय, एक दिन करल्यो पाणत।
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चारो  पटको  माछल़ी, पंछी   चींटी  ढोर।
वस्त्र दान करताँ कहो,प्रात सबै शुभ भोर।
प्रात सबै शुभ भोर,लगै फिर जाड़ो थोड़ो।
गुड़ बाँटो अरु खाय, खींचड़ो  होवै घोड़ो।
सबल़ाँ ताप अलाव, डरो क्यूँ जाड़ै  यारो।
सबकी   करो  सहाय, बणैलो  भाई चारो।
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✍✍?©
बाबू लाल शर्मा,”बौहरा”
सिकंदरा, दौसा,राजस्थान
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